भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 489

औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् १३१

(गतायु मरणासन्न) जाने तथा उसकी चिकित्सा न करे। चिकित्सा द्वारा गतायुष रोगी को लाभ क्यों नहीं होता इसके लिये सुश्रुत सू. अ. ३१ में कहा है—प्रेता भूताः पिशाचाश्च रक्षांसि विविधानि च। मरणाभिमुखं नित्यमुपसर्पन्ति मानवम् ॥ तानि भेषजवीर्याणि प्रतिघ्नन्ति जिघांसया। तस्मान्मोघाः क्रियाः सर्वा भवन्त्येव गतायुषाम् ॥५॥

यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते। सस्नेते भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम् ॥६॥

जिस मनुष्य के सिर पर गोबर के चूर्ण के सदृश तथा स्निग्ध चूर्ण हो जाता है और स्वयं विलीन हो जाता है, उसका जीवन एक मास अवशिष्ट समझना चाहिये। चरक इन्द्रिय अ. १२ में भी यह श्लोक बिलकुल इसी रूप में दिया गया है। इसी प्रकार सुश्रुत में भी कहा है—गोमयचूर्णप्रकाशस्य वा रजसो दर्शनमुत्तमाङ्गे बिलयनञ्च ॥६॥

कुक्षिः स्नातानुलिप्तस्य पूर्वं यस्य विशुष्यति। आर्द्वेषु सर्वगात्रेषु मासार्धं तस्य जीवितम् ॥७॥

जिस पुरुष के स्नान तथा अनुलेपन (चन्दन आदि का लेप) के बाद अन्य अङ्गों के गीला रहते हुए सबसे पूर्व कुक्षि (कोख) सूख जाती है। वह १५ दिन तक जीवित रहता है। चरक इन्द्रिय स्थान १२ में कुक्षि के स्थान पर उर (छाती) पढ़ा गया है—यस्य स्नानानुलिप्तस्य पूर्वं शुष्यत्युरोभृशम्। आर्द्वेषु सर्वगात्रेषु सोऽर्धमासं न जीवति ॥ इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३२ में कुक्षि के स्थान पर हृदय पढ़ा है—"प्राग्विशुष्यमाणहृदय आर्द्रशरीरः” ॥७॥

स्वप्नाधिपानगो नाशो ज्योतिषां पतनानि च। अग्निदाहोपशान्तिश्च पतनं गृहवृक्षयोः ॥८॥
गुहाटवीप्रवेशश्च स्वप्नं स्वप्ने विगर्हितम्। कृष्णां दण्डधरां नग्नां मुण्डां लोहितलोचनाम् ॥९॥
स्वप्ने दृष्ट्वैव जानीयाद्यमदूतानुपस्थितान्।

जो मनुष्य स्वप्न की अवस्था में नग (पर्वत) का नाश, ज्योतिवाले पदार्थों का गिरना, अग्निदाह से शान्ति, गृह एवं वृक्षों का पतन, गुफा तथा जंगल में प्रवेश और निन्दित स्वप्न देखता है तथा जो स्वप्न में काले रंग वाली, दण्ड को धारण करने वाली, नग्न मुण्डित (सिर जिसका मुंडा हुआ है) तथा लाल आंखों वाली स्त्री को देखता है-वह यम के दूतों को उपस्थित जाने अर्थात् मृत्यु को सन्निकृष्ट समझे ॥८-९॥

दीर्घकेशस्तननखीं विरागकुसुमाम्बराम् ॥१०॥
स्वप्ने दृष्ट्वा स्त्रियं कृष्णां कालरात्रीं निवेदयेत्।

स्वप्न में लम्बे बाल, लम्बे स्तन तथा लम्बे नखों वाली, विराग (विकृत रंग अथवा लाल रंग के) पुष्प एवं नक्षत्रों वाली, काली स्त्री को देखकर उसे कालरात्रि समझे अर्थात् उस रात्रि को कालरात्रि अथवा अन्तिम रात्रि समझे ॥१०॥

गन्धान् पुष्पाणि वासांसि या रक्तानि निषेवते ॥११॥
यदा स्वप्ने शिशुर्वादपि तदा स्कन्दग्रहाद्द्वयम्।
मयूरं कुक्कुटं बस्तं मेषं वा योऽधिरोहति ॥१२॥
रक्तार्चितः सहैतैर्वा तत्रापि स्कन्दतो भयम्।
घण्टां पताकां यः स्वप्ने विध्वस्तां भुवि पश्यति ॥१३॥
शयनं शोणिताक्तं वा तत्रापि स्कन्दतो भयम्।

अब ग्रहों द्वारा आक्रान्त शिशु के लक्षण कहे जाते हैं—स्कन्दग्रह—जब माता या शिशु स्वप्न में गन्ध वाले पदार्थ तथा लाल रंग के पुष्प एवं वस्त्रों को धारण करते हैं। अथवा बालक स्वप्न में मोर, मुर्गे, बकरे तथा मेंढे पर सवार होता है तथा रक्तचन्दन द्वारा उसका शरीर अर्चित हो। अथवा बालक स्वप्न में घण्टे तथा पताका को भूमि पर विध्वस्त