भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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१३२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ]

हुआ (फटा हुआ तथा नीचे गिरा हुआ) देखे तथा शयन (बिस्तरे) को रक्त से गीला देखे तो उस अवस्था में स्कन्दग्रह का भय समझना चाहिये ॥११-१३॥

रक्तपुष्पाम्बरधरा रक्तचन्दनरूषिता ।। १४ ।। नृत्यते सह भूतैर्वा स्कन्दापस्मारतो भयम् ।

यदि माता स्वप्न में लाल पुष्प तथा वस्त्रों को धारण करके तथा शरीर पर रक्तचन्दन का लेप करके भूतों (पिशाच आदियों) के साथ नृत्य करे तो उस अवस्था में स्कन्दापस्मार (स्कन्दसखा अथवा विशाख) का भय समझना चाहिये ॥१४॥

रक्तपद्मवनं प्राप्य धात्र्यात्मानं यदाऽर्चति ।। १५ ।। बालं वा पद्ममालाभिस्तदा स्कन्दपितुर्भयम् ।

यदि धात्री लाल कमल के वन में पहुंच कर पद्ममालाओं के द्वारा अपनी अथवा बालक की अर्चना करे तो स्कन्द के पिता अर्थात् त्रिपुरारि महादेव का भय समझना चाहिये ॥१५॥

रक्तपुष्पवनं धात्री स्वप्नेऽग्निं वा यदा विशेत् ।। १६ ।। दह्यते वाऽग्निना बालः पौण्डरीकाद्भयं तदा ।

पुण्डरीक—यदि धात्री स्वप्न में लाल फूलों वाले वन में अथवा अग्नि में प्रवेश करे तथा उसका शिशु अग्नि में जलाया जाता हो तो उस अवस्था में पुण्डरीक का भय समझना चाहिये ॥१६॥

समुद्रादिषु तोयेषु निमग्ने रेवतीभयम् ।। १७ ।। रेवती—स्वप्न में यदि बालक समुद्र आदि में अथवा अन्य जलों में डूबे-तो रेवती का भय समझना चाहिये ॥१७॥

शुष्ककूपनदीदर्श निहन्याच्छुष्करेवती । मांसादान् पक्षिणोदृष्ट्वा शकुन्या ब(व)ध्यते शिशुः ।। १८ ।। शुष्क रेवती—यदि स्वप्न में सूखे हुए कूंए तथा नदी का दर्शन हो तो शिशु शुष्क रेवती से आक्रान्त हुआ मर जाता है। शकुनी—यदि स्वप्न में मांसभक्षी पक्षियों (गिद्ध-बाज आदि) को देखे तो वह शकुनि द्वारा मार दिया जाता है ॥१८॥

अवडीनाभिदष्टस्तु सद्यो मरणमृच्छति । हरितालादिभी रङ्गैर्मण्डितः पीतकाम्बरः ।। १९ ।। मांसलोऽलङ्कृतः स्वप्ने तं हन्ति मुखमण्डिका ।

मुखमण्डिका—यदि बालक स्वप्न में किसी पक्षी के द्वारा काटा जाता है तो वह शीघ्र मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। स्वप्न में हरिताल आदि के रंगों से यदि आकाश को पीला रंगा हुआ देखता है तथा मांस का सेवन और अलंकारों (आभूषणों) को धारण करता है—उसे मुखमण्डिका नामक ग्रह मार देता है ॥१९॥

नक्षत्रग्रहचन्द्रार्कतारकाऽक्षिकनीनिकाः ।। २० ।। दृष्ट्वा प्रपतिताः स्वप्ने पूतनाभ्यो भयं भवेत् ।

पूतना—यदि स्वप्न में नक्षत्र, ग्रह, चन्द्र, सूर्य, तारे तथा आंखों की पुतलियां नीचे गिरी हुई दिखाई दें-तो पूतना का भय समझना चाहिये ॥२०॥

सर्वाण्येतानि रूपाणि नैगमेष्यां प्रपश्यति ।। २१ ।।

नैगमेष—ये ही पूर्वोक्त सब लक्षण नैगमेष ग्रह के होते है ॥२१॥