भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् १३३

कीटवृश्चिकसर्पैर्वा दष्टः स्याद्विषमृत्युःकः१। श्वभिर्दुष्टैः खरैर्वाऽपि दक्षिणां याति मुण्डितः ।।२२।।
कृष्यते मृद्यते तैर्वा ज्वरस्यान्तस्तदुच्यते ।

ज्वर के मारक रूप—यदि स्वप्न में कीड़े, बिच्छू अथवा सर्प के द्वारा काटा जाकर विष से मृत्यु हो जाय अथवा मुण्डित हुआ कुत्ते, दुष्टप्राणी अथवा गदहों द्वारा दक्षिण दिशा की ओर ले जाया जाता हो तथा उन्हीं के द्वारा रोगी खींचा जाता हो तथा उसका मर्दन किया जाता हो तो वह रोगी ज्वर के द्वारा समाप्त हो जाता है। अर्थात् ज्वर के द्वारा उसकी मृत्यु हो जाती है ।।२२।।

प्रार्थितं कल्पितं दृष्टमनुभूतं श्रुतं च यत् ।।२३।।
भावितः पश्यति स्वप्ने ह्रस्वं दीर्घं दिवा च यत् ।
अफलाः सर्व एवैते निदानोक्तास्तु दोषजाः ।।२४।।

स्वप्नों के प्रकार—जो स्वप्न (१) प्रार्थित (२) कल्पित (३) दृष्ट (४) अनुभूत (५) श्रुत एवं (६) भावित होते हैं तथा (७) जो अत्यन्त छोटे (८) जो अत्यन्त लम्बे (९) जो स्वप्न दिन में देखे जाने वाले तथा (१०) जो निदान स्थान में दोषज (वातादि दोषों से उत्पन्न होने वाले) कहे गये हैं—ये सब स्वप्न निष्फल होते हैं। चरक इन्द्रिय अ. ५ में ७ प्रकार के स्वप्न कहे हैं—दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थितं कल्पितं । तथा भाविकं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविधं विदुः ।। तत्र पञ्चविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत् । दिवा स्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घं तथैव च ।। अरुणदत्त ने इन सातों स्वप्नों का अपनी टीका में निम्न विवरण दिया है—१. दृष्टं—यश्चक्षुषा जाग्रदवस्थायां किंचिद् वस्तुजातं दृष्ट्वा तदानीं सुप्तावस्थायां तादृशं वस्तुजातं संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते स ‘दृष्ट’ उच्यते। दृष्ट स्वप्न वह होता है जिसे हम कभी भी जागृत अवस्था में देख चुके हों। २. श्रुत—यश्च शब्दमात्रेण वस्तुजातं श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यते तदिदानीं सुप्तावस्थायां तादृक्संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते स ‘श्रुत’ उच्यते। जिसे हम पहले कभी सुन चुके हों। ३. अनुभूत—यस्तु जाग्रदवस्थायां यथायथमिन्द्रियैरनुभूयते सुप्तावस्थायां तादृगन्तः संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते सोऽ ‘नुभूत’ उच्यते। जो कभी हमारे अनुभव में आया हो। ४. प्रार्थित—यस्मिन् दृष्टे श्रुतेऽनुभूते वा यत्पूर्वं जाग्रदवस्थायां वस्तुजातं मनसाऽभ्यर्थ्यते तथैव च सुप्तावस्थायामन्तः संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते स ‘प्रार्थित’ उच्यते। जिसकी हमें जागृत अवस्था में आकांक्षा होती है। ५ कल्पित—यस्तु षड्भिः प्रत्यक्षानुमानादिभिर्न दृष्टो नापि श्रुतो नाप्यनुमतो दृष्टश्रुतानुभूतत्वाभावादेव न च प्रार्थितोऽपि तु केवलं मनसा यथेच्छमुत्प्रेक्ष्य यत्किंचनरूपाभिः कल्पनाभिः कल्पितो जाग्रदवस्थायां वस्तुजातान्तः संवित्तावपारूढस्तदानीं सुप्तावस्थायां तादृगनुभूयते स “कल्पितः” । जिसकी पहले हम कभी कल्पना कर चुके हैं। ६. भाविक—यश्च दृष्टश्रुतादिभ्यः स्वप्नेभ्योऽन्यो विलक्षणः स्वप्नो यथा दृश्यते सुप्तावस्थायामुत्तरकालं तथैव स्वप्नदर्शिना नरेण तन्मुखाबगततदर्थैरपि प्रत्यक्षतो दृश्यते स ‘भाविकः’। जो भावी शुभ या अशुभ फलों के सूचक होते हैं। ७. दोषज—दोषजः स स्वप्नो यो वातजः पित्तजः कफजो वा यथायथं दोषाणामनुरूपोऽन्तः संवित्ताव्नुभूयते स ‘दोषज’ उच्यते। अर्थात् जो वातादि दोष से उत्पन्न होते हैं। इन उपर्युक्त ७. प्रकार के स्वप्नों में से प्रथम पांच (अर्थात् दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, प्रार्थित तथा कल्पित) तथा अत्यन्त लम्बे, अत्यन्त छोटे तथा दिवास्वप्न निष्फल माने गये हैं अर्थात् इन स्वप्नों का कोई फल नहीं होता है। शेष दोनों अर्थात् भाविक और दोषज फलप्रद होते हैं। चरक संहिता में दोषज स्वप्न को फलप्रद माना है परन्तु इस संहिता में उपर्युक्त श्लोक में दोषज स्वप्न को


१. यहां कीटादि का दंश विष के द्वारा मृत्यु का सूचक बताया गया है। इसके विपरीत सुश्रुत में ‘उरगो वा जलौको वा भ्रमरो वाऽपि यं दंशेत्। आरोग्यं निर्दिशेत्तस्य धनलाभं च बुद्धिमान् ।। इत्यादि शुभ फलों का सूचक श्लोक मुद्रित पुस्तक में मिलता है परन्तु सुश्रुत की ताडपत्र पुस्तक में यह श्लोक नहीं है।