काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ]
भी निष्फल माना है। अष्टाङ्गहृदय में भी प्रकृति के अनुकूल दोषज स्वप्न को निष्फल ही माना है। यदि पित्त प्रकृति के मनुष्य को पित्तानुकूल स्वप्न आये तो वह दोषज होने पर भी प्रकृति के अनुकूल होने से निष्फल ही होता है। वहां कहा है—‘‘तेष्वद्या निष्फलाः पञ्च यथा स्वप्रकृतिर्दिवा विस्मृतो दीर्घह्रस्वोऽति’’ ।।
यथा तु फलवान् स्वप्नो वृद्धजीवक ! तच्छृणु । अदृष्टमश्रुतानुक्तमकल्पितमभाषितम् ।। २५ ।। कार्यमात्रं च यः स्वप्नो जीर्णान्ते फलवांस्तु सः । एतांश्चान्यांश्च दुःस्वप्नान् दृष्ट्वा रोगी विनश्यति ।। २६ ।। स्वस्थस्तु संशयं गत्वा धर्मशीलो विमुच्यते ।
हे वृद्धजीवक ! जिस प्रकार के स्वप्न फल वाले (फलप्रद) होते हैं वे तू मेरे से सुन । १. अदृष्ट—जो कभी देखा न हो । २. अश्रुत—जो कभी सुना न हो । ३. अनुक्त—जो कभी कहा न गया हो । ४. अकल्पित—जिसकी कभी कल्पना न की गई हो तथा ५. अभाषित—जिसका कभी भाषण न किया गया हो । तथा ६. जो केवल कार्यमात्र हों अर्थात् जिनका देखना सुनना आदि कोई कारण विद्यमान न हों । समाप्त होने के बाद ये उपर्युक्त स्वप्न फलवाले होते हैं । इन उपर्युक्त तथा अन्य भी दुःस्वप्नों (बुरे स्वप्नों) को देखने से रोगी नष्ट हो जाता है अर्थात् जो रोगी इन बुरे स्वप्नों को देखता है उसकी मृत्यु हो जाती है तथा स्वस्थ व्यक्ति का जीवन संशय में पड़ जाता है । इससे केवल धर्मपरायण व्यक्ति ही बच सकता है । चरक इन्द्रिय अ. ५ में कहा है—इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्याति पञ्चताम् । अरोगः संशयं गत्वा कश्चिदेव विमुच्यते ।। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अध्याय २९ में भी कहा है—स्वस्थः स लभते व्याधिं व्याधितो मृत्युमृच्छति ।। २५-२६।।
यद्यदेव द्विजादीनां स्वप्ने शीतकृशात्मनाम् ।। २७ ।। मलिनाम्बरपुष्पाणां दर्शनं न प्रशस्यते । तेषामेव तु हृष्टानां शुद्धपुष्पाम्बरात्मनाम् ।। २८ ।। दर्शनं शस्यते स्वप्ने तैश्च संभाषणं शुभम् ।
अब शुभ फल वाले स्वप्न कहे जायेंगे—शीत (ठण्डे) एवं कृश शरीर वाले जिन द्विज (ब्राह्मण) आदियों का मैले वस्त्र तथा मैले रंग के पुष्प धारण किये हुए दर्शन प्रशस्त नहीं माना गया है । वे ही यदि स्वप्न में प्रसन्न तथा शुद्ध (श्वेत) पुष्प एवं वस्त्र धारण किये हुए दिखाई दें तथा उनसे बातचीत हो तो शुभ माना जाता है ।।२७-२८।।
प्रासादवृक्षशैलांश्च हस्तिगोवृषपूरुषान् ।। २९ ।। अधिरोहन्ति ये स्वप्ने तेषां स्वस्त्ययनं कृतम् ।
स्वप्न में जो प्रासाद (महल), वृक्ष, पर्वत, हाथी, गौ, वृष (बैल) तथा पुरुष की सवारी करते हैं उनका स्वस्त्ययन (कल्याण) होता है ।।२९।।
सूर्यसोमाग्निविप्राणां नृणां पुण्यकृतां गवाम् ।। ३० ।। मत्स्यामिषस्य चाषस्य दर्शनं पुण्यमुच्यते ।
स्वप्न में सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, विप्र (ब्राह्मण), पुण्यवाले मनुष्य, गौ, मछली के मांस तथा चाष नाम की मछली के दर्शन शुभ माने जाते हैं ।।३०।।
शुक्लपुष्पाददर्शच्छत्रग्रहणं तोयलङ्घनम् ।। ३१ ।। स्वरक्तदर्शनं चैव सुरापानं च शस्यते ।