भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 493

औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् १३५

स्वप्न में श्वेत पुष्प, आदर्श (दर्पण-शीशा) तथा छत्र (छाते का धारण करना) एवं पानी (नदी आदि) को लांघना, अपने रक्त का दर्शन तथा सुरापान प्रशस्त माना जाता है ॥३१॥

गवाश्वरथयानं च यानं पूर्वोत्तरेण च ।।३२।।
रोदनं पतितोत्थानं रिपूणां निग्रहस्तथा ।
पङ्ककूपगुहाभ्यश्च समुत्तारोऽध्वनस्तथा ।।३३।।
एवंविधानि चान्यानि सिद्धये मुनयोऽब्रुवन् ।

गौ तथा घोड़े के रथ पर सवार होना, पूर्व तथा उत्तर दिशा की ओर जाना, रोना, गिर कर पुनः उठना, शत्रुओं का दमन, कीचड़, कुएं, गुहा तथा मार्ग से पार होना—इत्यादि तथा इसी प्रकार के अन्य स्वप्नों को मुनियों ने सिद्धि (फल) वाला कहा है ॥३२-३३॥

अदारुणत्वं रोगाणां वैद्यभैषज्यसंभवम् ।।३४।।
धृतिर्जन्मानुकूल्यं च सत्त्वं धर्मश्च भूतये ।

इस प्रकार के स्वप्नों से रोग भयंकर नहीं होते । वैद्य तथा भैषज्य द्वारा अच्छे हो जाते हैं । धारण शक्ति बढ़ती है, जन्म की अनुकूलता होती है अर्थात् व्यक्ति स्वस्थ होकर जीवित रहता है तथा सत्त्व, धर्म एवं भूति (कल्याण) की वृद्धि होती है । चरक इन्द्रिय अ. ५ में शुभ फलवाले निम्न स्वप्न दिये हैं—दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफली भवेत् । न स्वपेद्यः पुनर्द्दष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः ।। अकल्याणमपि स्वप्नं दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः । पश्येत्सौम्यं शुभाकारं तस्य विद्याच्छुभं फलम् ।। रात्रि के पहले प्रहर में देखा हुआ स्वप्न अल्प फलवाला होता है । परन्तु स्वप्न देखने के पश्चात् यदि फिर निद्रा न आये तो वह स्वप्न महाफल वाला होता है । इसी प्रकार अशुभ स्वप्न देखने के पश्चात् यदि उसी समय दूसरा शुभ स्वप्न आ जाय तो उसका अशुभ फल नष्ट होकर शुभ फल ही होता है। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २९ में भी शुभस्वप्नों का निर्देश किया गया है—अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि प्रशस्तं स्वप्नदर्शनम् । देवान् विद्वान् गोवृषभान् जीवितः सुहृदो नृपान् ।। समिद्धमग्निं साधूंश्च निर्मलानि जलानि च । पश्येत् कल्याणलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। मांसं मत्स्यान् स्त्रजः श्वेता वांसासि च फलानि च । लभन्ते धनलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। महाप्रासादसफलवृक्षवारणपर्वतान् । आरोहेद् द्रव्यलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। नदीनदसमुद्रांश्च क्षुभितान् कलुषोदकान् तरेत् कल्यांणलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। उरगो वा जलौको वा भ्रमरो वाऽपि यं दशेत् । आरोग्यं निर्दिशेत्तस्य धनलाभं च बुद्धिमान् ।। एवं रूपान् शुभान् स्वप्नान् यः पश्येदृत्याधितो नरः । स दीर्घायुरिति ज्ञेयस्तस्मै कर्म समाचरेत् ॥३४॥

दृष्ट्वा स्वप्नान् दारुणांन्वेतरान् वा पूतः स्नातः सर्षपानग्निवर्णान् ।
हुत्वा सावित्र्या सर्पिषाक्तांस्तिलांश्च पूतः पापैर्मुच्यते व्याधिभिश्च ।।३५।।

अशुभ स्वप्नों का परिहार—इन दारुण अथवा इसी प्रकार के अन्य स्वप्नों को देखने के बाद व्यक्ति को स्नान द्वारा पवित्र होकर अग्नि के वर्ण वाले सर्षप (सरसों) तथा घी से मुक्त तिलों को सावित्री (गायत्री मन्त्र) के द्वारा अग्नि में आहुति देनी चाहिये । इससे वह पवित्र हो जाता है तथा पाप एवं व्याधियों से मुक्त हो जाता है । सुश्रुत सू. अ. २९ में भी अशुभ स्वप्नों का परिहार दिया गया है—स्वप्नानेवं विधान् दृष्ट्वा प्रतरुत्थाय यत्नवान् । दद्यान्माषांस्तिलांल्लोहं विप्रेभ्यः काञ्चनं तथा ।। जपेच्चापि शुभान् मन्त्रान् गायत्रीं त्रिपदां तथा । दृष्ट्वा तु प्रथमे यागे स्वप्याद् ध्यात्वा पुनः शुभम् ।। जयेद्वाऽन्यतमं देवं ब्रह्मचारी समाहितः । न चाचक्षीत कस्मैचिद् दृष्ट्वा स्वप्नमशोभनम् ।। देवतायतने चैव वसेद्रात्रित्रयं तथा । विप्रांश्च पूजयेन्नित्यं दुःस्वप्नात् प्रविमुच्यते ॥३५॥