भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 494

१३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ]

कौमारभृत्यमतिवर्धनमुक्तमेतज्ज्ञात्वा हि देहगतमिन्द्रियमादिरूपैः । श-श्चिकित्सितपरांस्तु विवर्जयध्वं शास्त्रं च धर्ममतयः परिपालयध्वम् ।। ३६ ।।

यह कौमारभृत्य सब से अधिक विशिष्ट (प्रशस्त) कहा गया है। अपने प्रारंभिक रूपों (लक्षणों) के द्वारा रोगी के देहगत इन्द्रियों (अरिष्टों) को जानकर सब चिकित्सकों को चाहिये कि वे रोगी को छोड़ दें अर्थात् उसकी चिकित्सा न करें तथा धर्ममति (धर्म में बुद्धि वाला) होकर शास्त्रों का पालन करना चाहिये। अर्थात् अरिष्ट लक्षण उत्पन्न हो जाने पर चिकित्सा से कोई लाभ नहीं होता है इसलिये इस अवस्था में व्यर्थ में चिकित्सा के पीछे न पड़कर धर्म-कर्म एवं शास्त्रों में मन लगाना चाहिये। संभवतः इससे कुछ लाभ हो सके।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

(इति) वृद्धजीवकीये कौमारभृत्ये वास्त्वप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने औषधभेषजीयं नामेन्द्रियम् ।। समाप्तानि चेन्द्रियाणि ।।

(इन्द्रियस्थानस्यायमन्तिमोऽध्याय एवोपलब्धः)