भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 942 में से

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षष्ठं चिकित्सास्थानम्

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ज्वरचिकित्सिताध्यायः ।

अथातो ज्वरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम ज्वर चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

प्रजापतिं समासीनमृषिभिः पुण्यकर्मभिः । पप्रच्छ विनयाद्विद्वान् कश्यपं वृद्धजीवकः ॥३॥
पुण्यकर्मा ऋषियों के साथ बैठे हुए प्रजापति कश्यप से विद्वान् वृद्धजीवक ने विनयपूर्वक पूछा ॥३॥

सूत्रस्थाने भगवता निर्दिष्टो द्विविधो ज्वरः । पुनरष्टविधः प्रोक्तो निदाने तत्त्वदर्शिना ॥४॥
भगवन् ! सूत्र स्थान में पहले तत्त्वदर्शी आपने दो प्रकार के ज्वर का निर्देश किया है। तथा पुनः निदानस्थान में ८ प्रकार के ज्वर बतलाये हैं।

**वक्तव्य—**यद्यपि इस संहिता के सूत्रस्थान के खण्डित होने से यह विषय यहां नहीं मिलता है तथापि ज्वरों के दो प्रकारों का चरक में भी उल्लेख मिलता है। चरक चि. अ. ३ में कहा है—द्विविधो विधिभेदेन ज्वरः शारीरमानसः । पुनश्च द्विविधो दृष्टः सौम्यश्चाग्नेय एव च ।। अन्तर्वेगो बहिर्वेगो द्विविधः पुनरुच्यते । प्राकृतो वैकृतश्चैव साध्यश्चासाध्य एव च ।। अनेक भेदों से ज्वर के दो प्रकारों का वर्णन किया गया है। सब से मुख्य शारीर एवं मानस भेद से ज्वर दो प्रकार का होता है। जब केवल शरीर में आश्रित होता है तब शारीर ज्वर कहलाता है। जब शरीर के साथ २ मन भी आक्रान्त होता है तब मानस ज्वर कहलाता है। सौम्य तथा आग्नेय भेद से भी ज्वर दो प्रकार का है। वेग के अनुसार भी अन्तर्वेग तथा बहिर्वेग भेद से ज्वर दो प्रकार का है। इसी प्रकार प्राकृत-वैकृत तथा साध्य-असाध्य भेद से भी ज्वर दो प्रकार का होता है। ज्वर के आठ प्रकार चरक नि. अ. १ में कहा है—अथ खल्वष्टभ्यः कारणेभ्यो ज्वरः संजायते मनुष्याणाम्, तद्यथा-वातात्, पित्तात्, कफात्, वातपित्ताभ्यां, वातकफाभ्यां, पित्तश्लेष्माभ्यां, वातपित्तश्लेष्मभ्यः, आगन्तोरष्टमात् कारणात्। आठ कारणों से ज्वर उत्पन्न होता है। १. वात, २. पित्त, ३. कफ, ४. वातपित्त, ५. वातकफ, ६. पित्तकफ, ७. वातपित्तकफ (सान्निपातिक), ८. आगन्तु, इसी प्रकार च. चि. अ. ३ में भी कहा गया है-भिन्नः कारणभेदेन पुनरष्टविधो ज्वरः ॥४॥

तेषां ज्वराणां कतमो जातमात्रस्य जायते । पूर्वरूपं च रूपं च किञ्च तस्य चिकित्सितम् ॥५॥
इतरेषां ज्वराणां च पूर्वरूपं सलक्षणम् । चिकित्सितं च किं तेषामामजीर्णज्वरेषु च ॥६॥

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