काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 496, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | ज्वरचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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क्षीरपस्य च किं पथ्यं पथ्यं किंवान्नभोजिनः । क्षीरान्नभोजिनः किंच ज्वरितस्य शिशोर्हितम् ।।७।।
कां च वृत्तिं ....................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ९२ तमं पत्रम्$^१$।)
नवजात शिशु को उन उपर्युक्त द्विविध तथा अष्टविध ज्वरों में से कौन सा ज्वर होता है । उस ज्वर के पूर्वरूप, रूप (लक्षण) तथा चिकित्सा क्या है ? अन्य ज्वरों के भी पूर्वरूप, रूप (लक्षण) तथा चिकित्सा क्या है ? आमज्वर तथा जीर्णज्वर में क्षीरप (दूध पीने वाले अर्थात् एक वर्ष तक के), अन्नभोजी (अन्न खाने वाले अर्थात् दो वर्ष से बड़े) तथा क्षीरान्नभोजी (दूध तथा अन्न दोनों का सेवन करने वाले अर्थात् एक से दो वर्ष तक के) बालकों को ज्वर में क्या पथ्य है ? उस ज्वर की वृत्ति (प्रवृत्ति) क्या है ॥५-७॥
वक्तव्य—पाठकों के ज्ञान के लिये उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर हम अन्य ग्रन्थों के आधार पर देने का प्रयत्न करेंगे ।
शारीर ज्वर—शारीर ज्वर वातादि के प्रकोप से पहले देह में होता है उसके बाद पीछे से मन भी आक्रान्त हो जाता है तथा इन्द्रियों की विकृति ही देहसन्ताप का मुख्य लक्षण है। इन्द्रियों की विकृति से ही देह की विकृति का ग्रहण हो जाता है। कहा भी है–इन्द्रियाणां च वैकृत्यं देहसन्तापलक्षणम्। मानस ज्वर-यह सर्वप्रथम मन में आश्रित होता है तथा तमोगुण एवं रजोगुण के कारण होता है। यह पीछे से शरीर को भी आक्रान्त कर देता है। चरक चि. अ. १ में कहा है–'वैचित्यमरतिग्लानिर्मनसस्तापलक्षणम्' अर्थात् चित्त का विक्षिप्त होना, किसी कार्य में मन न लगना तथा ग्लानि ये मानस ज्वर के लक्षण होते हैं। सौम्य तथा आग्नेय ज्वर-चरक चि. अ. ३ में कहा है–वातपित्तात्मकः शीतमुष्णं वातकफात्मकः । इच्छत्युभयमेतत्तु ज्वरो व्यामिश्रलक्षणः ।। योगवाही परं वायुः संयोगादुभयार्थकृत् । दाहकृत्तेजसा युक्तः शीतकृत्सोमसंश्रयात् ।। जिस ज्वर में वात के साथ पित्त का अनुबन्ध होगा वह आग्नेय तथा जिसमें वात के साथ कफ का अनुबन्ध होगा वह सौम्य ज्वर कहलाता है। आग्नेय ज्वर में रोगी शीत को तथा सौम्य ज्वर में उष्णता को चाहता है। यदि मिश्रित लक्षण हों तो वह शीत एवं उष्ण दोनों को चाहता है। अन्तर्वेगज्वर चरक चि. अ. ३ में कहा है—अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः । सन्ध्यस्थिशूलमस्वेदो दोषवचों विनिग्रहः ।। अन्तर्वेगस्य लिङ्गानि ज्वरस्यैतानि लक्षयेत् । अन्तर्वेग ज्वर में शरीर के अन्दर अधिक दाह, तृष्णा, प्रलाप, श्वास का अधिक वेग से चलना, भ्रम, सन्धियों तथा अस्थियों में शूल, पसीना न आना तथा दोष एवं पुरीष (मल) का अन्दर रुक जाना–ये लक्षण होते हैं। बहिर्वेग ज्वर—सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम्। बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च ।। बहिर्वेग ज्वर में–बाह्यताप (Temperature) बहुत अधिक होता है तथा तृष्णा आदि लक्षण मृदु होते हैं तथा यह सुखसाध्य होता है। प्राकृत तथा वैकृत ज्वर चरक चि. अ. ३ में कहा है—प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसन्तशरदुद्भवः । कालप्रकृतिमुद्दिश्य प्रोच्यते प्राकृतो ज्वरः । प्रायेणानिलजो दुःखः कालेष्वन्येषु वैकृतः ।। काल की प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार ही ज्वर प्राकृत कहा जाता है। वसन्त और शरद् ऋतु में होने वाला प्राकृत ज्वर सुखसाध्य होता है। वसन्त कफ का प्रकोप-काल है इसलिये वसन्त में कफज्वर प्राकृत होता है। शरद् पित्त का प्रकोप-काल है इसलिये शरद् ऋतु में होने वाला पित्तज्वर प्राकृत होता है। ये दोनों ज्वर सुखसाध्य होते हैं। परन्तु वात के प्रकोप-काल (वर्षा) में उत्पन्न वातिक ज्वर प्राकृत होते हुए भी कष्ट साध्य है। अन्य कालों में वैकृतज्वर कष्टसाध्य होते हैं। जैसे वसन्त में पैत्तिक ज्वर अथवा शरद् में कफज्वर का होना वैकृत ज्वर कहलाते हैं। ये कष्टसाध्य होते हैं। साध्यज्वर—बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वरः साध्योऽनुपद्रवः । बलवान् तथा अल्प दोष वाले पुरुषों में उपद्रवों से रहित जो ज्वर होता है उसे साध्य कहते हैं। असाध्यज्वर—हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः । ज्वरः
१. अस्याग्रे अष्टपत्रात्मको ग्रन्थः खण्डितंस्ताडपत्रपुस्तके।