भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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१४२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् गर्भिणीचिकित्सिताध्यायः ? ]

कामलारोग (पीलिया—Gaundice)—कामला रोग में पिप्पली तथा अङ्कोठ की जड़ को घोड़े की लीद के रस में मिला कर भैंस की दही के साथ सेवन करना चाहिये ॥

मातुलुङ्गरसः पेयः सैन्धवेन सुयोजितः ।।
हृदि शूलस्य भैषज्यं श्रेष्ठमित्याह कश्यपः । पिप्पलीमूलकल्कस्तु पत्रं गन्धप्रियङ्गवः ।
मातुलुङ्गरसश्चैव हृदि शूलस्य भेषजम् । प्रियङ्गवोऽथ पिप्पल्यो भद्रमुस्तं हरेणवः ।।
क्षौद्रं बदरचूर्णं च षडङ्गं हृदयौषधम् ।

हृदयरोग (Heart disease)—भगवान् कश्यप कहते हैं कि मातुलुङ्ग (बिजौरै) के रस में उचित परिमाण में सैन्धव डालकर पिलाना हृच्छूल को श्रेष्ठ ओषधि है। पिप्पलीमूल का कल्क, तेजपत्र तथा गन्धप्रियङ्गु (फूल प्रियङ्गु) को मातुलुङ्ग के रस के साथ हृच्छूल में देना चाहिये तथा प्रियङ्गु, पिप्पली, भद्रमुस्ता, हरेणु, मधु तथा बेर का चूर्ण ये ६ हृदय रोग की ओषधियां हैं ॥

स्निग्धो मांसरसः पथ्यः सैन्धवेनावचूर्णितः ।
माहिषे षष्टिका वाऽपि स्यादम्ले त्वचि मारुते ।

त्वचागत वायु रोग में सैन्धव नमक डालकर स्निग्ध मांसरस अथवा सांठी के चावल भैंस के दही के साथ मिला कर देना पथ्य है ।

भद्रदारुहरीतक्यौ सैन्धवं कुष्ठमेव च । सफाणितं घृतं चैव लेह ऊर्ध्वानिलापहः ।

ऊर्ध्ववात में—भद्रदारु (देवदारु), हरड़, सैन्धव, कुष्ठ तथा फणित (राब) में घी मिलाकर अवलेह बनाकर देने से ऊर्ध्ववात रोग नष्ट होता है ॥

पिप्पल्यो गैरिकं भार्गी हिङ्गु कर्कटकी तथा ! समाक्षिको भवेल्लेहो हिक्काश्वासनिबर्हणः ।

हिक्का तथा श्वासरोग में—पिप्पली, गेरु, भारङ्गी, हींग तथा काकड़ाशृङ्गी के चूर्ण को मधु के साथ अवलेह बनाकर देने से हिक्का तथा श्वासरोग नष्ट होते हैं ॥

पिप्पली पिप्पलीमूलं मुस्ता नागरमेव च । दीपनीयं पिबेदेतं पयसा शर्कराऽन्वितम् ।।

पिप्पली, पिप्पलीमूल, नागरमोथा तथा सोंठ के चूर्ण को शर्करायुक्त दूध के साथ पीने से अग्नि दीप्त होती है ॥१४॥

नित्यं स्नाता च हृष्टा च शुक्लवस्त्रधरा शुचिः ।।
देवविप्रपरा सौम्या गर्भिणी पुत्रभागिनी ।।
नैवोन्नता न प्रणता न गुरुं धारयेच्चिरम् ।।
उद्वेजनं तथा हास्यं संघातं चापि वर्जयेत् ।।

गर्भिणी का आचरण—पुत्र की इच्छा करने वाली गर्भिणी को चाहिये कि वह नित्य स्नान करे, प्रसन्न रहे, शुभ्र वस्त्रों को धारण करे, मन को पवित्र रखे, देवताओं तथा ब्राह्मणों का सम्मान करे, सौम्य रहे और उसे बहुत ऊँचा उठना, बहुत झुकना, बहुत देर तक भारी पदार्थों को उठाना, कांपना, अधिक हंसना तथा संघात (चोट) का त्याग कर देना चाहिये । अर्थात् गर्भिणी को उपर्युक्त क्रियाएं नहीं करनी चाहिये क्योंकि इनसे गर्भपात का भय रहता है ।

वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में गर्भोपघातकर भावों का वर्णन किया गया है—गर्भोपघातकरास्त्विमे भावा भवन्ति; तद्यथा-उत्कटुकविषमकठिनासनसेविन्या वातमूत्रपुरीषवेगानुपुरुन्धत्या दारुणानुचितव्यायामसेविन्यास्तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेविन्याश्च