भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 506
१४८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्बालग्रहचिकित्सिताध्यायः ? ]

उसके बाद रेवती की मनोगत इच्छा को जानकर उग्र तपस्या द्वारा स्कन्द की आराधना करते हुए गुह (कार्तिकेय) ने रेवती से पुनः कहा कि चार भाइयों के साथ पांचवां भाई नन्दिकेश्वर तथा छठी तू बहन के रूप में प्रसिद्ध होगी ।।

यथा मां पूजयिष्यन्ति तथा त्वां सर्वदेहिनः । अस्मत्तुल्यप्रभावा त्वां भ्रातृमध्यगता सदा ।।

जिस प्रकार सम्पूर्ण प्राणी मेरी पूजा करेंगे उसी प्रकार तेरी भी पूजा करेंगे। हमारे ही समान प्रभाव वाली तू सदा भाइयों के साथ रहेगी।

षण्मुखी नित्यललिता वरदा कामरूपिणी ।
षष्ठी च ते तिथिः पूज्या पुण्या लोके भविष्यति ।।

तू ६ मुखों वाली, सदा प्रसन्न, वर देने वाली तथा काम-रूपिणी (इच्छानुरूप रूप धरने वाली) होगी। तथा लोके में पुण्यकारक षष्ठी तिथि को तेरी पूजा हुआ करेगी। अर्थात् षष्ठी तिथि तेरी पूजा का दिन माना जायगा।

इत्येवं भगिनी जज्ञे षष्ठी स्कन्दस्य धीमतः ।
तस्मात् सा सततं पूज्या सा हि मूलं सुखायुषोः ।।

इस प्रकार षष्ठी (रेवती) बुद्धिमान् स्कन्द की बहन के रूप में जाती है। इसलिये उसकी नित्य पूजा करनी चाहिये। क्योंकि वह सुख तथा आयु का मूल है अर्थात् वह सुख और आयु का कारण है ।।

• तस्माच्च सूतिकाषष्ठीं पक्षषष्ठीं च पूजयेत् ।
उद्दिश्य षण्मुखीं षष्ठीं तथा लोकेषु नन्दति ।।

इसलिये सूतिकाषष्ठी (प्रसव के बाद छठी तिथि) तथा पक्षषष्ठी (प्रत्येक शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की छठी तिथि) को षण्मुखी (६ मुखों वाली) षष्ठी (रेवती) की पूजा करनी चाहिये। इससे वह संसार में प्रसन्न रहती है। इस प्रकार देवता तथा असुरों द्वारा भी नमस्कार की गई (आदृत) रेवती प्रसिद्ध हुई है ।।

इत्येवं रेवती जज्ञे सुरासुरनमस्कृता । वृद्धजीवक ! कर्माणि शृणु तस्याः प्रधानतः ।।

हे वृद्धजीवक ! अब मुख्यरूप से तू उस (रेवती) के कर्मों को सुन। अर्थात् उसके द्वारा उत्पन्न होने वाले रोगों को सुन ।।

ज्वरातिसारो वैसर्पः पीडनेन्द्रियदूषणम् । आनाहः शूलमरुचिर्मि.... नं श्वासकासतृट् ।।
निद्रानाशोऽतिनिद्रा च मुखपाको व्रणोद्भवः । एकाङ्गकः पक्षवधः क्षीरालसविषूचिकाः ।।
हिक्का मूर्च्छा मदो मोहो रोदनं स्तब्धनेत्रता । स्वरवर्णाग्निभेदश्च पाण्डुत्वं कामलाऽरतिः ।।
क्षीरदूषणनाशौ च शिरोरुग्हृदयद्रवः । नासाक्षिकर्णरोगाश्च त्रासकुञ्चनरोदनम् ।।
ये चान्ये चैव विविधा ये रोगा नानुकीर्तिताः । रेवतीरोषसंभूता भूयिष्ठं त उदाहताः ।।

रेवती ग्रह के द्वारा होने वाले रोग—ज्वर, अतिसार, विसर्प, पीड़ा, इन्द्रियों का दूषित होना, आनाह, शूल, अरुचि, श्वास, कास, तृषा (प्यास), निद्र्रानाश (अनिद्रा-Insomnia), अतिनिद्रा, मुखपाक, व्रणोत्पत्ति, एकाङ्गवात, पक्षाघात, क्षीरालसक (बालरोग विशेष), विसूचिका, हिक्का, मूर्च्छा, मद, मोह, रोदन (रोना), नेत्रों का स्तब्ध होना, स्वरभेद, वर्णभेद, अग्निभेद, पाण्डु, कामला, अरति, क्षीरदोष, क्षीरनाश, शिरोरुक् (शिरःशूल), हृदयद्रव (Palpitation of heart), नासारोग, अक्षिरोग, कर्णरोग, त्रास (डरना), कुञ्चन (Conual-Sions) रोदन-ये तथा अन्य भी बहुत से रोग जिनका वर्णन नहीं किया गया है-उन्हें रेवती के क्रोध से ही उत्पन्न हुए समझना चाहिये।