काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालग्रहचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १४७
वह शब्द करता है । द्वितीय दिन, मास वा वर्ष में सुनन्दा नामक मातृका बालक पर आक्रमण करती है जिससे उपर्युक्त ही लक्षण होते हैं । तृतीय दिन, मास वा वर्ष में पूतना नामक मातृका के आक्रमण करने से ज्वर, चक्षु उन्मीलन, गात्रोद्वेजन, मुट्ठियों का बन्द हो जाना, क्रन्दन, ऊर्ध्व निरीक्षण आदि लक्षण होते हैं । चतुर्थ दिन, मास व वर्ष में मुखमण्डिका नामक मातृका के आक्रमण करने से ज्वर, चक्षु उन्मीलन, ग्रीवा नमन, तथा रोदन आदि लक्षण होते हैं । बच्चे को नीद नहीं आती तथा वह दूध नहीं पीता । पञ्चम दिन, मास व वर्ष में कटपूतना नामक मातृका बालक पर आक्रमण करती है जिससे ज्वर हो जाता है । छठे दिन मास व वर्ष में शकुनिका नामक मातृका बालक पर आक्रमण करती है जिससे शरीर में पीडा तथा ऊर्ध्व निरीक्षण आदि लक्षण हो जाते हैं । सातवें दिन, मास व वर्ष में शुष्करेवती आक्रमण करती है जिससे ज्वर, गात्रोद्वेजन तथा मुष्टिबद्धता आदि लक्षण होते हैं । आठवें दिन, मास व वर्ष में अर्यका मातृका, नवम मास दिन व वर्ष में स्वस्तिकामातृका, दसवें दिन वर्ष व मास में निर्ऋतामातृका, ग्यारहवें दिन, मास व वर्ष में कामुकामातृका बालक पर आक्रमण करती है । इन सबके आक्रमण से बालक अस्वस्थ हो जाते हैं । इनके प्रतीकार के लिये इनकी पूजा एवं बलि आदि देनी चाहिये इसका विस्तृत विवेचन रावणकृत बालतन्त्र में देखना चाहिये । प्रत्येक ग्रह के अपने २ भिन्न २ लक्षण होते हैं । परन्तु कुछ लक्षण सब ग्रहों के सामान्य होते हैं । योगरत्नाकर में ग्रहों के सामान्य लक्षण निम्न दिये हैं—क्षणादुद्विजते बालः क्षणात् त्रस्यति रोदिति । नखैर्दन्तैर्दरयति धात्रीमात्मानमेव च ।। ऊर्ध्वं निरीक्षते दन्तान्खादेत्कूजति जृम्भति । भ्रुवौ क्षिपति दन्तोष्ठं फेनं वमति चासकृत् ।। क्षामोऽतिनिशि जागर्ति शूनाङ्गो भिन्नविट्स्वरः । मांसशोणितगन्धिश्च न चाश्नाति यथा पुरा ।। दुर्बलो मलिनाङ्गश्च नष्टसंज्ञोऽपि जायते । सामान्यग्रह जुष्टानां लक्षणं समुदाहृतम् ।। अब हम मूल अध्यायोक्त विषय पर आते हैं—ब्रह्मण्य भाव से क्रुद्ध हुई भी उसने अनुग्रह पूर्वक वचन कहा कि रेवति । तू इनके व्यतिक्रम के फल को प्राप्त कर । वीर्य एवं बल में समान होने से तू सब ग्रहों की अपेक्षा दुर्धर्ष होगी तथा देवताओं द्वारा भी तू पूजित होगी ।।
नामभिर्बहुभिश्चैव त्वां वक्ष्यन्ति जना भुवि । वारुणी रेवती ब्राह्मी कुमारी बहुपुत्रिका ।।
शुष्का षष्ठी च यमिका धरणी मुखमण्डिका । माता शीतवती कण्डूः पूतनाऽथ निरुन्धिक्रा ।।
रोदनी भूतमाता च लोकमातामहीति च । शरण्या पुण्यकीर्तिश्च नामानि तव विंशतिः ।।
संसार में लोग तुझे अनेक नामों से जानेंगे । तेरे ये निम्न २० नाम हैं—१. वारुणी २. रेवती ३. ब्राह्मी ४ कुमारी ५. बहुपुत्रिका ६. शुष्का ७. षष्ठी ८. यमिका ९. धरणी १०. मुखमण्डिका ११. माता १२ शीतवती १३. कण्डू १४. पूतना १५. निरुन्धिका १६. रोदनी १७. भूतमाता १८. लोकमातामही १९. शरण्या २०. पुण्यकीर्ति तेरे ये २० नाम होते हैं ।।
ये च त्वां पूजयिष्यन्ति श्रद्धाना जना भुवि । नैतेषां सर्वभूतेभ्यो भविष्यति भयं क्वचित् ।
संसार में जो लोग श्रद्धापूर्वक तेरी पूजा करेंगे उन्हें किसी भी भूत (प्राणी) से कभी भय नहीं रहेगा ।।
सायं प्रातश्च नामानि यो जपेत्तव विंशतिम् ।।
शुचिर्नरः प्रजास्तस्य वर्धिष्यन्ति विपाप्मनः ।
जो मनुष्य शुद्ध एवं पवित्र होकर सायं प्रातः तेरे २० नामों का जप करेगा उसकी सन्तान रोग रहित होकर वृद्धि को प्राप्त करेगी ।
तत उग्रेण तपसा स्कन्दमाराधयन् पुनः । तस्या मनीषितं ज्ञात्वा रेवतीमब्रवीद् गुहः ।।
भ्रातृणां च चतुर्णां वै पञ्चमो नन्दिकेश्वरः ।
भ्राता त्वं भगिनी षष्ठी लोके ख्याता भविष्यसि ।।