भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 504

१४६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | बालग्रहचिकित्सिताध्यायः ? ]

दोनों पञ्चमूल, भारंगी, रास्ना, दोनों पुनर्नवा (श्वेत तथा रक्त), सहिंजना तथा हंसपदी ...... (इत्यादि ओषधियों का सेवन कराने से भी सूतिका रोगों में लाभ होता है) ॥२५॥

(इति ताडपत्रपुस्तके १०१ तमं पत्रम्) पर अध्याय यहीं बीच में ही खण्डित हो गया है।


बालग्रहचिकित्सिताध्यायः ।

.................................................. ..................................श्राभियाचनम् ।

ब्रह्मण्यभावात् क्रुद्धोऽपि प्राह सानुग्रहं वचः । एषां व्यतिक्रमाणां त्वं फलमाप्नुहि रेवति ! ।।
सर्वग्रहाणामेका त्वं तुल्यवीर्यबलद्युतिः । भविष्यसि दुराधर्षा देवानापि पूजिता ।।

वक्तव्य—यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित है। इसमें बालकों के ग्रहों का तथा उनके द्वारा आक्रान्त बालकों की चिकित्सा का वर्णन किया गया है। ये ग्रह संख्या में ९ होते हैं। कहते हैं कि जिस घर में देवयोग तथा पितृयोग आदि न हो, देवता, ब्राह्मण तथा अतिथियों का सत्कार न हो, आचार विचार आदि का ध्यान न रहता हो, उस घर में इन ग्रहों में से कोई घुसकर गुप्तरूप से बालक की हत्या कर डालते हैं अथवा उसे रोगों से आक्रान्त कर देते हैं। सुश्रुत उ. अ. २७ में कहा गया है—धात्रीमात्रोः प्राक्प्रदिष्टोपचाराच्छौचभ्रष्टान्मङ्गलाचारहीनान् । त्रस्तान् हृष्टांस्तर्जितांस्ताडितान् वा । पूजाहेतोर्हिंस्युरेते कुमारान् ॥ ग्रहों के नाम—१. स्कन्द, २. स्कन्दापस्मार, ३. शकुनी, ४. रेवती, ५. पूतना, ६. अन्धपूतना या गन्धपूतना, ७. शीतपूतना, ८. मुखमण्डिका, ९. नैगमेष। इनमें से कुछ ग्रह स्त्री शरीर वाले तथा कुछ पुरुष शरीर वाले होते हैं। इनकी उत्पत्ति के विषय में कहा जाता है कि ये ग्रह देवसेनानी कुमार कार्तिकेय की रक्षा के लिये महादेव तथा पार्वती द्वारा उत्पन्न किये गये थे। कार्तिकेय की रक्षा के लिये उत्पन्न हुए ये ग्रह बालकों को किस लिये आक्रान्त करते हैं इसके लिये सुश्रुत में निम्न वर्णन दिया है—ततो भगवति स्कन्दे सुरसेनापतौ कृते । उपतस्थुर्ग्रहाः सर्वे दीप्तशक्तिधरं गुहम् ॥ ऊचुः प्राञ्जलयश्चैनं वृत्तिं नः संविधत्स्व वै । तेषामर्थे ततः स्कन्दः शिवं देवमचोदयत् ॥ ततो ग्रहांस्तानुवाच भगवान् भगनेत्रहृत् । तिर्यग्योनिं मानुषं च दैवं च त्रितयं जगत् ॥ परस्परोपकारेण वर्तते धार्यतेऽपि च । देवा मनुष्यान् प्रीणन्ति तैर्यग्योनींस्तथैव च ॥ वर्तमानैर्यथाकालं शीतवर्षोष्ममारुतैः । इज्याञ्जलिनमस्कारजपहोमव्रतादिभिः ॥ नराः सम्यक् प्रयुक्तैश्च प्रीणन्ति त्रिदिवेश्वरान् । भागधेयं विभक्तं च शेषं किंचिन्न विद्यते ॥ तद्युष्माकं शुभा वृत्तिर्बलिष्वेव भविष्यति । कुलेषु येषु नेज्यन्ते देवाः पितर एव च ॥ ब्राह्मणाः साधवश्चैव गुरवोऽतिथयस्तथा । निवृत्ताचारशौचेषु परपाकोपजीविषु ॥ उत्सन्नबलिभिक्षेषु भिन्नकांश्योपभोजिषु । गृहेषु तेषु ये बालास्तान् गृहीध्वमशङ्किताः ॥ तत्र वो विपुला वृत्तिः पूजा चैव भविष्यति । एवं ग्रहाः समुत्पन्ना बालान् गृह्णन्ति चाप्यतः ॥ ग्रहोपसृष्टा बालास्तु दुश्चिकित्स्यतमा मताः ॥ अन्यत्र इनका प्रयोजन न होने से बालकों से ही इनका सम्बन्ध होता है। इसीलिये ऊपर कहा है—"तद्युष्माकं शुभा वृत्तिर्बलिष्वेव भविष्यति" वास्तव में ये भिन्न २ प्रकार के बालकों के रोग ही हैं जिन्हें ग्रहों का नाम दे दिया गया है। प्राचीनकाल में स्वस्थवृत्त (Hygiene) की दृष्टि से सूतिकागारों का संभवतः उचित प्रबन्ध न होने से बालकों को अनेक प्रकार के रोग घेर लेते थे उन्हें ही सम्भवतः ग्रहरोगों का नाम दिया गया है। रावणकृत बालतन्त्र में इन बालग्रहों का अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया गया है। ये ग्रह बालकों को जन्म से लेकर १२ वर्ष की अवस्था तक पीडित करते हैं। उससे ऊपर की अवस्था वालों को ग्रहों की विशेष शंका नहीं रहती है। वहां निम्न वर्णन मिलता है—प्रथम दिन, प्रथम मास वा प्रथम वर्ष में जब नन्दा नामक मातृका बालकों पर आक्रमण करती है तब ज्वर हो जाता है आंखें बन्द हो जाती हैं, शरीर सदा दुःखी होता है जिससे बालक शयन नहीं कर सकता। सदा रोता ही रहता है उसे शब्द अच्छा नहीं लगता तथा