काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदुष्प्रजाताचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १४५
पिप्पली पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पली । चव्यं द्वे रजनी चैव शृङ्गवेरं वचाऽभया ।। १८ ।। कुष्ठं रास्नाऽजमोदश्च विडङ्गं मरिचानि च । भद्रदारुरथैला च भार्गीकुटजतण्डुलाः ।। १९ ।। एतेषां कार्षिका भागा लवणानां पलं भवेत् । तैलप्रस्थं वसाप्रस्थं निष्क्वाथो द्विगुणो भवेत् ।। २० ।। क्षीरप्रस्थो दधिप्रस्थो जलप्रस्थस्तथैव च । मातुलुङ्गाम्रपेशीनां रसप्रस्थार्धयोजितम् ।। २१ ।। शनैर्मृद्वग्निना सिद्धमथैनमवतारयेत् । अभ्यञ्जनेषु पानेषु बस्तिकर्मणि चोत्तमम् ।। २२ ।। ये तु वातसमुत्थानाः सूतिकानामुपद्रवाः । सर्वेषां शमनं श्रेष्ठमेतत्त्रैवृतमुत्तमम् ।। २३ ।।
इनकी चिकित्सा—दोनों पञ्चमूल (स्वल्प तथा बृहत्) भारंगी, मीठा सहिंजना, शतावरी, खस, चन्दन, गोखरू, मंदयन्तिका (नवमल्लिका-मेंहदी-Henna), दोनों बला (बला और अतिबला या नागबला), वसुक (बकपुष्प), पाठा, पयस्या (क्षीरकाकोली अथवा जीवन्ती), अमृता (गिलोय) वृषादनी (इन्द्रवारुणी), सुगन्धा (कालाजीरा), पुनर्नवा, मरोड़फली, गृध्रनखी (कण्टकपाली अथवा बेर), नागरमोथा, मोरट१ (मूर्वाभेद-क्षीरचूरिनि), लोध्र-इनमें से जिन २ की मूल मिल सके वह लेले तथा यव, कोल (बेर) और कुलत्थ के सम्मिलित तीन प्रस्थ लेवे। इन्हें आठ गुने जल में पकायें। अष्टमांश शेष रहने पर उसे उतार कर छान कर रख लें। इसमें निम्न ओषधियों का मुष्टिक प्रमाण में प्रक्षेप डालें—पिप्पली, पिप्पलीमूल, चित्रक, गजपीपल, चव्य, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, आर्द्रक, वच, हरड़, कुष्ठ, रास्ना, अजमोद, विडङ्ग, मरिच, देवदारु, छोटी इलायची, भारंगी, कुटज तथा तण्डुल-प्रत्येक १ कर्ष, पांचों लवण १ पल, तिलतैल १ प्रस्थ, वसा १ प्रस्थ, दूध १ प्रस्थ, दही १ प्रस्थ, जल १ प्रस्थ, मातुलुङ्ग तथा आम्र की पेशी का रस आधा प्रस्थ। इन सबको मिलाकर धीरे २ मृदु अग्नि पर पकाये तथा सिद्ध होने पर उतार लें। यह योग अभ्यञ्जन (नेत्रों में अञ्जनार्थ), पान (पीना) तथा बस्तिकर्म में उत्तम है। प्रसूता स्त्रियों के वात से उत्पन्न जो भी उपद्रव होते हैं उन सबको शान्त करने के लिये यह उत्तम त्रैवृत्त योग है ।।१३-२३।।
एतेषामेव सर्वेषां कल्कं निष्क्वाथ्य पाययेत् । यः कश्चित् सूतिकाव्याधिस्तं त्रिरात्रेण साधयेत् ।। २४ ।।
इन्हीं उपर्युक्त द्रव्यों के कल्कों का क्वाथ बनाकर पिलाने से प्रसूता की व्याधियां तीन दिन में ठीक हो जाती हैं ।।
द्वे पञ्चमूल्यौ भार्गी च रास्ना द्वे च पुनर्नवे । शिग्रुर्हंसपदी .......................................... .............................................................. ..............................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके १०१ तमं २पत्रम् ।)
१. मोरट—मोरटः क्षीरबहुलो मधुरः सकषायकः । पित्तदाहज्वरान् हन्ति वृष्यो बलविवर्धनः ।। (राजनिघण्टु) । २. मूलताडपत्रपुस्तके एतत्पत्रप्रान्तस्य कीटदष्टतया शतस्थानीय एकोऽङ्को दृश्यते । लिपिरप्येतदीया पूर्वापरालोचने अत्रैव त्रुटितभागे पूरणे संवदति । पश्चात् खिलभागे अन्तर्वलीचिकित्सितस्योल्लेखेन तेन सह विषयसंगमनेऽपि सत्र पत्रत्रुटेरभावेन लिपिविसंवादेन पूर्वोक्तविषयस्य खिलभागे पूना रूपान्तरेण निरूपणस्य दर्शनेन, अत्र ग्रहपूतनाविषयात् पूर्वं गर्भिणीदुष्प्रजाताचिकित्सितप्रदर्शनस्यौचित्येन च १०१ तमं किलैतत्पत्रमित्यत्र संनिवेशितम् । अस्याग्रे पत्रद्वयात्मको ग्रन्थः खण्डितस्ताडपत्रपुस्तके ।