भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 502

१४४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् दुष्प्रजाताचिकित्सिताध्यायः ? ]

(बिस्तर) पर सुखपूर्वक सोती है अर्थात् उसके रोगों की शान्ति हो जाती है जिससे वह आराम से सो सकती है ॥४-५॥

रात्रौ निर्गमनात्रासात् सहसोत्पतनादपि । ईर्ष्याशोकभयक्रोधान्नानावेगविधारणात् ॥६॥
एतैश्चान्यैश्च नारीणां व्याधयः संभवन्ति हि । सूतिकानां दिवास्वप्नादजीर्णाद्ध्यशनादपि ॥७॥

**रोगों के निदान—**रात्रि को घर से बाहर को घर से बाहर निकलने, डरने, सहसा गिरने, ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, नाना वेगों को धारण करने, दिवास्वप्न (दिन में सोने), अजीर्ण, अध्यशन आदि तथा अन्य भी कारणों से प्रसूता स्त्रियों को रोग हो जाते हैं।

**वक्तव्य—**अध्यशन—पहले खाये हुए आहार के पूर्णरूप से न पचने पर यदि उस पर और भोजन कर लिया जाय तो वह अध्यशन कहलाता है। चरक चि. अ. १२ में कहा है—"भुक्तं पूर्वान्नशेषे तु पुनरध्यशनं मतम्" ॥६-७॥

योनिपृष्ठकटीभेदशाखावायुरसृग्दरः । वाताष्ठीला च गुल्मश्च हृदि शूलं प्रवाहिका ॥८॥
पुरीषमूत्रसंरोध आध्मानं शूलमेव च । शूयते दुष्यते योनिर्योनिशूलं च दारुणम् ॥९॥
वेपथुश्छर्दनं मोहो मन्यास्तम्भो हनुग्रहः । ज्वरातिसारो वैसर्पो दद्रुपामाविचर्चिकाः ॥१०॥
किटिभान्यथ विस्फोटा गात्रे चार्धाशिरोरुजा । हृद्रोगाश्चाक्षिरोगाश्च प्लीहा श्वयथुकामले ॥११॥
एते चान्ये च बहवो दुष्प्रजाताशरीरजाः । व्याधयः संप्रकुप्यन्ति चिकित्सितमतः परम् ॥१२॥

**रोगों के नाम—**दुष्प्रजाता स्त्रियों को योनिभेद, पृष्ठभेद, कटीभेद, शाखान्वायु, रक्तप्रदर, वाताष्ठीला, गुल्म, हृच्छूल, प्रवाहिका, पुरीषरोध (मल का रुक जाना), मूत्ररोध (मूत्र का रुक जाना), आध्मान, शूल, योनिशोथ, योनिदोष, भयंकर योनिशूल, वेपथु (कंपकपी), वमन, मोह, मन्यास्तम्भ (Torticolis) हनुग्रह, ज्वर और अतिसार (अथवा ज्वरातिसार), विसर्प, दद्रु, पामा, विचर्चिका, किटिभ (कुष्ठ भेद), शरीर में विस्फोट, आधासीसी (आधे सिर में दर्द), हृद्रोग, अक्षिरोग, प्लीहा, श्वयथु, कामला तथा अन्य बहुत से रोग हो जाते हैं। इसके बाद इनकी चिकित्सा कही जायगी।

**वक्तव्य—वाताष्ठीला—**यह वातरोग भी है तथा मूत्राघात का भेद भी है। सुश्रुत में इनके निम्न लक्षण दिये हैं—
**वाताष्ठीला (वातरोग)—**अष्ठीलावद्धनं ग्रन्थिमुर्ध्वमायतमून्नतं। वाताष्ठीलां विजानीयाद्बहिर्मार्गविरोधिनीम्॥ (सु. नि. अ. १) सुश्रुत की टीका में घाणेकर जी ने इसे Cancer of the Rectum or Prostate कहा है। **वाताष्ठीला (मूत्राघात का भेद)-**शकृन्मार्गस्य बस्तेश्च वायुरन्तरमाश्रितः। अष्ठीलावद्धनं ग्रन्थि करोत्यचलमुन्नतम्॥ विण्मूत्रानिलसङ्गश्च तत्राध्मानं च जायते। वेदना च परा बस्तौ वाताष्ठीलेति तां विदुः॥ (सु. उ. अ. ५८) विचर्चिका सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—राजयोऽतिकण्डूवत्तिरुजः सरूक्षा भवन्ति गात्रेषु विचर्चिकायाम्॥ इसमें हाथ पांव आदि में अत्यन्त खाज होती है इसे Rhagades कहते हैं। किटिभयत् खावि वृत्तं घनमुग्रकण्डु। तत् स्निग्धकृष्णं किटिभं वदन्ति॥ (सु. नि. अ. ५) यह एक कुष्ठ का भेद है जो स्रावयुक्त, गोल, ठोस, अत्यन्त खाजयुक्त, चिकना और काला हो उसे किटिभ कहते हैं। इसे आधुनिक विज्ञान की भाषा में Psoriasis कह सकते हैं ॥८-१२॥

द्वे पञ्चमूले भार्गी च मधुशिग्रुः शतावरी । उशीरं चन्दनं चैव श्वदंष्ट्रा मदयन्तिका ॥१३॥
द्वे बले वसुकः पाठा पयस्या हामृता तथा । वृषादनी सुगन्धा च तथा कार्या पुनर्नवा ॥१४॥
मूर्वा गृध्रनखी मुस्ता मोरटस्तिल्वदस्तथा । इत्येतासां तु मूलानि यथालाभं समानयेत् ॥१५॥
यवकोलकुलत्थानां त्रयः प्रस्थाः समास्ततः । एतान्यष्टगुणे तोये पाचयेद्विषगुत्तमः ॥१६॥
अष्टभागस्थितं तं तु परिपूतं निधापयेत् । तत्रावापमिदं दद्यान्मुष्टिकान्यौषधानि तु ॥१७॥