काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बालग्रहचिकित्सिताध्यायः ? ]
एतेषां तु त्वचं बालो माता धात्री च धारयेत् । उपद्रवाँश्च शमयेद्दृष्ट्वा स्वैः स्वैश्चिकित्सितैः ।। नक्षत्रे चास्य रेवत्यां पुष्टिकर्माणि कारयेत् ।
वरुण, दोनों अरिष्ट (निम्ब तथा महानिम्ब), पुत्रञ्जीवक (जम्बीर के समान पत्तों वाला वृक्ष-पितौंजिया) तथा चित्रक—इनकी त्वचा (छाल) को बालक, माता तथा धात्री को धारण करना चाहिये । तथा अपनी २ चिकित्सा के द्वारा उपद्रवों को शान्त करना चाहिये । इसके अतिरिक्त रेवती नक्षत्र में इसके पुष्टिकर्मों को करे । सुश्रुत उ. अ. ३१ में भी इसकी लगभग ऐसी ही चिकित्सा विस्तार से दी है ।
अतश्चोर्ध्वं प्रवक्ष्यामि पूतनायाश्चिकित्सितम् ।। यदुक्तं पूर्वभैषज्यं तच्च सर्वं प्रचारयेत् ।
इसके बाद अब मैं पूतना नामक ग्रह की चिकित्सा कहूंगा । जो पूर्व रेवतीग्रह में चिकित्सा कही है वह सब यहां करे ।।३०।।
असुरो दुन्दुभिर्नाम सुरासुरभयङ्करः ।। स्कन्दमायोधयन्मोहात् क्रुद्धं दृष्ट्वा च षण्मुखम् । विवेश क्रौञ्चस्य गुहां मातुलस्य महागिरेः ।। स्कन्दस्तं च महाशैलं मातुलं तं च दानवम् । शक्त्या जघान युगपत्ततो गुहवधाद् गुहः ।। आसीद्वर्णपरिभ्रष्टस्तं समेत्य सुरासुराः । दिशः समुद्राः सरितो महाभूतानि तोयदाः ।। पूत्यर्थं धूपयामासुस्ततः पूतोऽभवद् गुहः । यस्मिन् देशे तु भगवान् पूतः स्कन्दो महाबलः ।। संजज्ञे पूतना तस्मात् सर्वलोकभयङ्करी । तामब्रवीद् गुहः पुण्यां पूतनामग्रतः स्थिताम् ।। याहि त्वं भिन्नमर्यादा(न्)चेत्युक्ताऽऽह तथाऽस्त्विति । मलजा पूतना कौञ्जी (क्रौञ्ची) वैश्वदेवी च पावनी ।। पञ्चनामेति चाप्युक्ता शृणु तस्याश्चिकित्सितम् ।
पूतना की उत्पत्ति—देवता तथा राक्षसों में भयंकर अर्थात् अत्यन्त शक्तिशाली दुन्दुभि नामक राक्षस स्कन्द (कार्तिकेय) से युद्ध करता हुआ उसे क्रुद्ध देखकर अज्ञान से अपने मामा क्रौञ्च की विशाल पर्वत (हिमालय में स्थित) गुहा (गुफा) में घुस गया। स्कन्द ने अपनी शक्ति से युगपत् (एक साथ) उस दुन्दुभि नामक राक्षस, उसके मामा (क्रौञ्च) तथा विशाल पर्वत तीनों का संहार कर दिया। इसलिये गुह (गुफा) का वध करने के कारण वह गुह कहलाता है। इस युद्ध से कार्तिकेय का वर्णनाश हो गया। इसलिये उसे पवित्र करने के लिये सब देवता, असुर, दिशायें, समुद्र, सरिताएं (नदियां), महाभूत तथा बादलों ने उनके पास जाकर धूपन किया। इस प्रकार गुह (कार्तिकेय) पवित्र हो गया। जिस प्रदेश (स्थान) में महाबली भगवान् स्कन्द (कुमार कार्तिकेय) पवित्र हुए वह देश सब लोकों में भयंकर पूतना नामक ग्रह के रूप में प्रसिद्ध हुआ। तब गुह ने अपने सामने स्थित उस पुण्यकारक पूतना को कहा कि तू भिन्नमर्यादा (यज्ञ, बलि, कर्म, पवित्रता आदि की मर्यादा का पालन न करने वाले) वाले लोगों के पास जाकर उनमें प्रवेश कर। उसने उत्तर दिया—ऐसा ही होगा। उसके मलजा, पूतना, कौञ्जी (क्रौञ्ची), वैश्वदेवी तथा पावनी ये पांच नाम कहे गये हैं। अब तू उसकी चिकित्सा सुन ।।
करञ्जशोभाञ्जनकावास्फोटा ह्याटरूषकः ।। सप्तपर्णश्च निम्बश्च भार्गी च परिषेचनम् ।