भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 526
१६८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

रक्तगुल्म का लक्षण—उस स्त्री के स्तन के मण्डल (अग्रभाग) काले हो जाते हैं, लोमराजि प्रकट हो जाती है, दोहद (विशेष इच्छायें जो गर्भावस्था के समय गर्भिणी को हुआ करती है) के लक्षण प्रकट होने लगते हैं तथा अव्यक्त (अस्पष्ट) रूप से गर्भिणी के सभी लक्षण उसे प्रतीत होने लगते हैं। उसे अपचन, पाण्डु तथा कृशता विशेषरूप से हो जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों वाला स्त्रियों में रक्तगुल्म कहलाता है। चरक नि. अ. ३ में कहा है—तस्याः शूलकासातिसारच्छर्द्यरोचकाविपाकाङ्गमर्दनिद्रालस्यस्तैमित्यकफप्रसेकाः समुपजायन्ते, स्तनयोश्च स्तन्यं, ओष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च कार्ष्ण्यं, ग्लानिश्चक्षुषोः, मूर्च्छा, हल्लासो, दोहदः, श्वयथुः पादयोः, ईषच्चोद्गमो रोमराज्याः, योन्याश्चारालत्वं, अपि च योन्या दौर्गन्ध्यमास्त्रावश्चोपजायते, केवलश्चास्याः गुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भो गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः। चरक चि. अ. ५ में और सुश्रुत उ. अ. ४२ में भी ऐसा ही कहा है ॥१८-१९॥

अनेकदोषसंघातो गुल्मवद्गुल्म उच्यते। त्रिदोषजादृते गुल्माः सिद्ध्यन्ति न चिरोत्थिताः ॥२०॥

गुल्म का स्वरूप—गुल्म के समान अनेक दोषों का संघात होने से इसे गुल्म कहते हैं। सब चिरोत्थित गुल्म त्रिदोष के बिना नहीं हो सकते हैं। सुश्रुत उ. अ. ४२ में भी कहा है—कुपितानिलमूलत्वाद् गूढमूलोदयादपि। गुल्मवद्वा विशालत्वाद् गुल्म इत्यभिधीयते॥ अर्थात् सब गुल्मों का मूल कुपित वायु के होने से, मूल (उत्पत्ति कारण) के गूढ (गुप्त-अनिश्चित) होने से, तथा गुल्म (वनस्पति संघात) के समान विशाल होने से इसे गुल्म कहते हैं॥

गुल्मिनं प्रथमं वैद्यः स्नेहस्वेदोपपादितम्। यथास्वदोषशमनैरौषधैः समुपक्रमेत् ॥२१॥

सर्वप्रथम वैद्य स्नेहन तथा स्वेदन किये हुए गुल्म रोगी की भिन्न २ दोषों की शामक ओषधियों से चिकित्सा करे। चरक चि. अ. ५ में कहा है—भोजनाभ्यञ्जनैः पानैर्निरूहैः सानुवासनैः। स्निग्धस्य भिषजा स्वेदः कर्तव्यो गुल्मशान्तये॥ अन्यत्र भी कहा है—सर्वत्र गुल्मे प्रथमं स्नेहस्वेदोपपादिते। या क्रिया क्रियते सिद्धिं सा याति न विरुक्षिते ॥२१॥

बृंहणं चातिगुल्मेषु भृशं चातिविरूक्षणम्। अतिसंशोधनं चैव गुल्मिनां न प्रशस्यते ॥२२॥

गुल्मरोगी में अतिबृंहण, अतिरूक्षण तथा अतिसंशोधन (वमन-विरेचन) हितकर नहीं होता है। चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—तस्मान्ना नातिसौहित्यं कुर्यान्नातिविलङ्घनम् ॥२२॥

अभया पिप्पली व्योषं यावशूकोऽथ चित्रकः। सौवर्चलं विडङ्गानि वचा चेत्यक्षसंमिताः ॥२३॥
सम्यक्पक्वं घृतप्रस्थं तत् पिबेच्च यथाबलम्। घृतं दशाङ्गमित्येतद्वातगुल्मनिवारणम् ॥२४॥

वातगुल्म की चिकित्सा—हरड़, पिप्पली, त्रिकटु (सोंठ, मरीच, पीपल), यवक्षार, चित्रक, काला नमक, विडङ्ग तथा वच प्रत्येक १ कर्ष। १ प्रस्थ-घृत। इसे अच्छी प्रकार पकाकर अपनी शक्ति के अनुसार सेवन करें। यह दशाङ्ग घृत कहलाता है। यह वातगुल्म को नष्ट करता है ॥२३-२४॥

सैन्धवं यावशूकश्च पिप्पली हस्तिपिप्पली।
शुण्ठी चित्रक इत्येषां षड्भागाः पलिका पृथक् ॥२५॥
तुल्यक्षीरं घृतं प्रस्थं पक्वं षट्पलमुच्यते। षट्पलं सर्वगुल्मेषु वैद्याः प्राहुर्यथाऽमृतम् ॥२६॥

सैन्धव, यवक्षार, पिप्पली, गजपिप्पली, सोंठ तथा चित्रक इनके ६ भाग पृथक् एक २ पल (अर्थात् सब मिलाकर ६ पल लें) दूध- १ प्रस्थ। घृत- १ प्रस्थ। यथाविधि घृत पाक करे। यह षट्पल घृत कहलाता है। वैद्य सब गुल्मों में षट्पल घृत को अमृत के समान मानते हैं। चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—षट्पलं वा पिबेत्सर्पिर्यदुक्तं राजयक्ष्मणि ॥२५-२६॥