काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 525, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६७
हैं—श्लेष्मा त्वरय शीतज्वरारोचकाविपाकाङ्गमर्दहर्षहृद्रोगच्छर्दिनिद्रालस्यस्तैमित्यगौरवशिरोभितापानुपनयति, अपि च गुल्मस्य स्थैर्यगौरवकाठिन्यावगाढसुप्तताः, तथा कासश्वासप्रतिश्यायायान् राजयक्ष्माणं चातिप्रवृद्धः, श्वैत्यं च त्वङ्नखनयनवदनमूत्रपुरीषे, षूपजनयति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, तद्विपरीतानि चोपशेरत इति श्लेष्मगुल्मः। अर्थात् अन्य लक्षणों के साथ २ जिन आहार विहार आदि से श्लेष्मगुल्म उत्पन्न होता है वे असात्म्य तथा उनसे विपरीत सात्म्य होते हैं। इसी प्रकार चरक चि. अ. ५ में भी कहा है ॥१३॥
सर्वाण्येतानि रूपाणि लक्ष्यन्ते सान्निपातिके।
सान्निपातिक गुल्म के लक्षण—सान्निपातिक गुल्म में ये सब लक्षण होते हैं। चरक नि. अ. ३ में कहा है— त्रिदोषहेतुलिङ्गसन्निपातस्तु सान्निपातिकं गुल्ममुपदिशन्ति कुशलाः। स विप्रतिषिद्धोपक्रमत्वादसाध्यो निचयगुल्मः। इसी प्रकार चरक चि. अ. ५ में भी कहा है ॥१३-१/३॥
रक्तगुल्मः स्त्रिया योनौ जायते न नृणां क्वचित् ॥१४॥
रक्तगुल्म—रक्तगुल्म केवल स्त्रियों की योनि (स्त्रीजाति) में ही होता है। पुरुषों में कभी नहीं होता। चरक नि. अ. ३ में भी कहा है—शोणितगुल्मस्तु खलु स्त्रिया एवं भवति न पुरुषस्य, गर्भकोष्ठार्त्तवागमनवैशेष्यात्। अर्थात् दूषित आर्तव के कारण जो रक्तगुल्म होता है वह केवल स्त्रियों को ही होता है। अन्यत्र भी कहा है—स्त्रीणामात्तर्वजो गुल्मो न पुंसामुपजायते। अन्यस्त्वसृग्भवो गुल्मः स्त्रीणां पुंसाञ्च जायते॥ अर्थात् सामान्य रक्त की दृष्टि से पुरुषों में भी रक्तगुल्म हो सकता है परन्तु रक्त के दूष्य होने से इसका अन्तर्भाव पित्तगुल्म में ही हो जाता है ॥१४॥
दुष्प्रजाता (ऽऽम)गर्भा च गर्भस्त्रूर्बहुमैथुना। अन्व१क्षगर्भकामा च बहुशीतार्तवा च या ॥१५॥
उदावर्त्तनशीला च वातलान्ननिषेविणी। या स्त्री तस्याः प्रकुपितो वातो योनिं प्रपद्यते ॥१६॥
निरुणद्ध्यार्तवं तत्र मासिकं संचिनोति च। रक्ते च संस्थिते नारी गर्भिण्यस्मीति मन्यते ॥१७॥
रक्तगुल्म का निदान एवं सम्प्राप्ति—जो स्त्री दुष्प्रजाता (जिसका प्रसव सम्यक् प्रकार न हुआ) हो, जिसका गर्भ अभी कच्चा हो, जिसका गर्भस्राव हो गया हो, जो बहुत मैथुन करती हो, जो बहुत शीघ्रता से गर्भ को धारण करती हो, जिसका आर्तव बहुत शीतल हो, जिसे प्रायः उदावर्त होता हो, जो वातकारक अन्नों (आहारों) का सेवन करती हो- उसका प्रकुपित हुआ वायु योनि में पहुंचकर आर्तव को रोक देता है जिससे मासिक स्राव इकट्ठा हो जाता है। इस प्रकार वहां रक्त के स्थिर हो जाने से स्त्री अपने आपको गर्भिणी समझने लगती है। चरक चि. अ. ५ में कहा है— ऋतावानाहारतया भयेन विरूक्षणैर्वेगविनिग्रहैश्च। संस्तम्भनोल्लेखनयोनिदोषैर्गुल्मः स्त्रियं रक्तभवोऽभ्युपैति॥ अर्थात् ऋतुकाल में आहार न करने से, गर्भस्थिति के भयमात्र से रूक्ष आहार विहार आदि से, वेगों को रोकने से, रक्तस्तम्भक आहार विहार अथवा औषध के प्रयोग से तथा वमन एवं योनि रोगों के कारण स्त्री को रक्तगुल्म हो जाता है। इसी प्रकार चरक नि. अ. ३ में और सुश्रुत उ. अ. ४२ में भी कहा है ॥१५-१७॥
स्तनमण्डलकृष्णत्वं रोमराजिः सदोहदा। गर्भिणीरूप २मव्यक्तं भजते सर्वमेव तु ॥१८॥
वि(अ)पाकपाण्डुकाश्र्यानि भवन्त्यभ्यधिकानि तु। इत्येवं लक्षणं स्त्रीणां रक्तगुल्मं प्रचक्षते ॥१९॥
१. 'अन्वगन्वक्षमनुगेऽनुपदम्' इत्यमरः। अतिशीघ्रमिति यावत्।
२. एवंप्राय एव विषयश्चरके निदानस्थाने तृतीयाध्याये मुद्रितभेडसंहितायां चिकित्सास्थानस्य पञ्चमाध्याये (गुल्मचिकित्सायां) च प्रपञ्चितः।