भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 528

१७० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

गुल्मिनां बद्धवर्चसां ......................... । ..................................................... .....................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ११८ तमं पत्र¹म् ।)


तथा जिन्हें मलबन्ध रहता हो उन गुल्म रोगियों की ......... (स्नेहन के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये)। .........................................................................................................

वक्तव्य— यह अध्याय उपर्युक्त श्लोक के मध्य में ही खण्डित हो गया है इसलिये उसी श्लोक के शब्दों को बतलाना तो कठिन है परन्तु फिर भी चरक चि. अ. ५ में कहा है—बद्धविण्मरुतं स्नेहैरादितः समुपाचरेत्। इसीके अनुसार उपर्युक्त श्लोक के भावार्थ को पूर्ण किया गया है। अथवा सुश्रुत उ. अ. ४२ में कहा है—बद्धवर्चोनिलानां तु सार्द्रकं क्षीरमिष्यते। अर्थात् उन्हें दूध में अदरक डालकर देनी चाहिये। इससे आगे इस अध्याय में अन्य गुल्मों की चिकित्सा दी जानी चाहिये। परन्तु इस अध्याय के मध्य में ही खण्डित हो जाने से वे उपलब्ध नहीं हैं। अतः हम पाठकों के साधारण ज्ञान के लिये अन्य आर्ष ग्रन्थों के आधार पर शेष गुल्मों की सामान्य चिकित्सा लिखेंगे। पित्तगुल्म की चिकित्सा चरक चि. अ. ५ में कहा है—स्निग्धोष्णोन्मर्दिते गुल्मे पैत्तिके स्त्रंसनं हितम्। रूक्षोष्णेन तु संभूते सर्पिः प्रशमनं परम्।। अर्थात् पित्तगुल्म में स्त्रंसन कराना चाहिये। तीव्र विरेचन नहीं देना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ४२ में कहा है—पित्तगुल्मर्दितं स्निग्धं काकोल्यादि घृतेन तु। विरिक्तं मधुरैर्योगैर्निरूहैः सानुवासनैः ।। अर्थात् काकोल्यादि घृत अथवा अन्य मधुरगण युक्त निरूहों से मृदु विरेचन देना चाहिये। यदि गुल्म के विदग्ध होने की सम्भावना हो तो विदाह से पूर्व ही रक्तावसेचन कराना चाहिये। इससे गुल्म विदाह को प्राप्त नहीं होगा। रक्तावसेचन के बाद जांगल पशुपक्षियों के मांस रसों से तर्पण करे। यदि किसी कारण से गुल्म में विदाह हो ही जाय तो उसमें शस्त्रकर्म ही करना चाहिये। चरक में कहा है—रक्तपित्तातिवृद्धत्वात्क्रियामनुपलभ्य च। यदि गुल्मो विदह्येत शस्त्रं तत्र भिषग्जितम्।। कफ गुल्म की चिकित्सा चरक चि. अ. ५ में कहा है—शीतलैर्गुरुभिः स्निग्धैर्गुल्मे वाते कफात्मके। अवम्यस्याल्पकायाग्नेः कुर्याल्लङ्घनमादितः ।। इसके बाद रोगी को उष्ण, कटु तथा तिक्त द्रव्यों का सेवन कराना चाहिये। यदि रोगी को आनाह तथा विबन्ध हो तो उसको युक्तिपूर्वक स्वेदन कराना चाहिये। इस प्रकार लङ्घन, वमन, एवं स्वेदन से अग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर क्षार तथा कटु द्रव्यों से युक्त घी का प्रयोग करे। यदि गुल्म बहुत हठी हो अर्थात् ठीक न होता हो और जड़ जमाली हो तो उसमें देश, काल तथा ऋतु के अनुसार क्षार प्रयोग, अरिष्टपान तथा अग्निकर्म कराना चाहिये। चरक चि. च. ५ में कहा है—कृतमूलं महावास्तुं कठिनं स्तिमितं गुरुम्। जयेत्कफकृतं गुल्मं क्षारारिष्टाग्निकर्मभिः ।। दोषप्रकृतिगुल्मर्तुयोगं बुद्ध्वा कफोल्बणे । बलदोषप्रमाणज्ञः क्षारं गुल्मे प्रयोजयेत् ।। एकान्तरं द्वयन्तरं वा त्र्यहं विश्रम्य वा पुनः। शरीरबलदोषाणां वृद्धिक्षपणकोविदः ।। श्लेष्माणं मधुरं स्निग्धं मांसक्षीरघृताशिनः । भित्त्वाभित्त्वाऽऽशयात्क्षारः क्षरत्वात्क्षारयत्यधः ।। मन्देऽग्नावुरुचौ सात्म्ये मद्ये सस्नेहमशनताम्। प्रयोज्या मार्गशुद्ध्यर्थमरिष्टाः कफगुल्मिनाम् ।। लङ्घनोल्लेखनैः स्वेदैः सर्पिष्पानैर्विरेचनैः। बस्तिभिर्गुटिका चूर्णक्षारारिष्टगणैरपि ।। श्लैष्मिकः कृतमूलत्वाद्यस्य गुल्मो न शाम्यति। तस्य दाहो हृते रक्ते शरलोहादिभिर्हितः ।। औष्यात्तैक्ष्ण्याच्च शमयेदग्निर्गूल्मे कफानिलौ । तयोः शमाच्च संघातौ गुल्मस्य विनिवर्तते ।। सन्निपातिक गुल्म की चिकित्सा—व्यामिश्रदोषैर्व्यामित्र एष एव क्रियाक्रमः । अर्थात् सान्निपातिक गुल्म में दोषों के अनुसार उपर्युक्त मिश्रित चिकित्सा करनी चाहिये। रक्तगुल्म की चिकित्सा—रक्त गुल्म की चिकित्सा पित्तगुल्म की तरह ही की जाती है। सुश्रुत उ. अ. ४२ में कहा है—पित्तवद्रक्तगुल्मिन्या नार्याः कार्यः क्रियाविधिः । विशेषमपरं चास्याः शृणु रक्तविभेदनम् ।। पलाशक्षारलोपेन सिद्धं सर्पिः प्रयोजयेत् ।। दद्यादुत्तरवस्तिं च


१. अस्याग्रे पत्रमेकं खण्डितं ताडपत्रपुस्तके ।