भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 529
कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]चिकित्सास्थानम्१७१

पिप्पल्यादिघृतेन तु। ऊर्ध्वौर्वा भेदयेन्निन्ने विधिरासृग्दरोहितः॥ अर्थात् इसमें अधोगत रक्तपित्त की चिकित्सा करनी चाहिये। रक्तगुल्म की चिकित्सा का विधान १० मास व्यतीत हो जाने के बाद दिया गया है। चरक चि. अ. ५ में कहा है—स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो। मासि व्यतीते दशमे चिकित्स्यः॥ क्योंकि उस समय ही यह सुख साध्य होता है। कहा भी है—'रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम्'। इसे देखकर कई लोग कहते हैं कि प्राचीन आचार्यों को रक्तगुल्म तथा गर्भ की भेदक पहचान न होने से ही १० वें मास (गर्भ काल) के व्यतीत हो जाने पर चिकित्सा करने का लिखा है। परन्तु उनका यह विचार ठीक नहीं है क्योंकि 'यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैः, द्वारा उन्होंने गुल्म का गर्भ से स्पष्ट भेद दिखाया है। इसलिये प्राचीन आचार्य इससे अनभिज्ञ नहीं थे अपितु १०वें मास के बाद जो चिकित्सा का विधान लिखा है वह उसके सुखसाध्य होने के कारण ही लिखा है। १० मास व्यतीत हो जाने के बाद रक्तगुल्म के रोगी (स्त्री) को स्नेहन तथा स्वेदन के बाद एरण्ड तैल अथवा किसी अन्य स्नेह का विरेचन देना चाहिये। चरक में कहा है—रौधिरस्य तु गुल्मस्य गर्भकालव्यतिक्रमे। स्निग्धस्विन्नशरीरायै दद्यात्स्नेहविरेचनम्॥ गुल्म को शिथिल करने के लिये पलाशक्षारयमक—(पलाश क्षार के साथ समभाग तिलतैल तथा घृत का पाक करने से बनता है) का प्रयोग करना चाहिये। यदि इन प्रयोगों से भी गुल्म का भेदन न हो तो रोगिणी को उत्तरबस्ति (दशमूलक्वाथ की) तथा योनिविशोधन करना चाहिये। योनि से रक्त के प्रवृत्त होने पर उसे मांसरस और ओदन खाने को दे तथा घी और तेल की मालिश करे तथा पीने के लिये मद्य दे। आगे प्रकृत ग्रन्थ के खिलस्थान के रक्तगुल्मविनिश्चयाध्याय में इस विषय का विशद विवेचन स्वयं आचार्य ने किया है। वहां गर्भ से रक्तगुल्म का भेद, उसके लक्षण एवं चिकित्सा आदि का विस्तार से वर्णन किया है। इस विषय को पाठक वहां पर देखें।

कुष्ठचिकित्सिताऽध्यायः ।

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स्वेदो वाऽतिखरत्वमङ्गानामतिश्लक्ष्णता वा वैवर्ण्यं रौक्ष्यं लोमहर्षः पिपासा गौरवं रागो दौर्बल्यं वेपथुः पिडकारुषां संभवश्चातिवेदना च क्षतविसर्पणमिति ।।

वक्तव्य—इस अध्याय में कुष्ठ रोगों की चिकित्सा कही गई है। यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। उस अंश में कुष्ठ रोग के उत्पन्न होने के कारण तथा सम्प्राप्ति इत्यादियों का वर्णन किया गया होगा। तथा 'स्वेदो वाऽतिखरत्वं' इत्यादि अध्याय के प्रारंभिक वाक्य द्वारा कुष्ठों के पूर्वरूप दिये गये हैं। अब हम अध्यायोक्त विषय पर आते हैं—

कुष्ठों के पूर्वरूप—स्वेद (स्वेद का अधिक आना या बिलकुल न आना), अङ्गों की खरता (खुरदरापन) अथवा अत्यन्त चिकना होना, वर्ण का विकृत हो जाना, रूक्षता, लोम (रोम) हर्ष, प्यास, शरीर का भारीपन, उस स्थान का लाल होना, दुर्बलता, कंपकंपी, पिडकाओं तथा छोटी २ फुन्सियों की उत्पत्ति, अत्यन्त वेदना तथा क्षतविसर्प—ये कुष्ठों के पूर्वरूप होते हैं। चरक नि. अ. ५ में कुष्ठ के निम्न पूर्वरूप दिये हैं—तेषामिमानि खलु पूर्वरूपाणि; तद्यथा-अस्वेदन-प्रतिस्वेदन-पारुष्यमतिश्लक्ष्णता वैवर्ण्यं कण्डूर्निस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो लोमहर्षः खरत्वमुष्मायणं गौरवं श्वयथुर्विसर्पणमभीक्ष्णं कायच्छिद्रेषूदेहपक्वदग्धदष्टक्षतोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति कुष्ठपूर्वरूपाणि भवन्ति। चरक चि. अ. ७ में भी कहा है—स्पर्शाज्ञत्वमतिस्वेदो न वा वैवर्ण्यमुन्नतिः। कोठानां लोमहर्षश्च कण्डूस्तोदः श्रमः क्लमः॥ व्रणानामधिकं शूलं शीघ्रोत्पत्तिश्चिरस्थितिः। दाहः सुप्ताङ्गता चेति कुष्ठलक्षणमग्रजम्॥ इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—त्वक्पारुष्यमकस्माद्रोमहर्षः कण्डूः स्वेदबाहुल्यमस्वेदनं वाऽङ्गप्रदेशानां स्वापः क्षतविसर्पणमसृजः कृष्णता चेति॥