काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 536, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]
बहुलं कुरुते मूत्रमल्पबाधं सितं घनम् ।। बस्तिगौरवशोथौ च मूत्राघाते कफात्मके ।
श्लैष्मिक मूत्रकृच्छ्र के लक्षण—इसमें रोगी को मूत्र बहुत आता है तथा मूत्रत्याग के समय कष्ट कम होता है। मूत्र का रंग श्वेत और घना (सान्द्र) होता है तथा बस्ति में भारीपन एवं शोथ हो जाती है। चरक चि. अ. २६ में कहा है—बस्तेः सलिङ्गस्य गुरुत्वशोथौ मूत्रं सपिच्छं कफमूत्रकृच्छ्रे। सुश्रुत उ. अ. ५९ में भी कहा है—स्निग्धं शुक्लमनुष्णं च मुष्कमेहनबस्तिभिः । संहृष्टरोमागुरुभिः श्लेष्माघातेन मेहति ।।
द्वन्द्वजं द्वन्द्वरूपेभ्यः सर्वेभ्यः सान्निपातिकम् ।। रक्तजं पित्तवज्ज्ञेयं सरक्तस्य च मूत्रणात् ।
दो २ दोषों के मिले हुए लक्षणों से मूत्रकृच्छ्र को द्वन्द्वज तथा सब दोषों के सम्मिलित लक्षणों से उसे सान्निपातिक जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—सर्वाणि रूपाणि तु सन्निपाताद्भवन्ति तत्कृच्छ्रतमं तु कृच्छ्रम्। सुश्रुत उ. अ. ५९ में कहा है—दाहशीतरुजाविष्टो नानावर्णं मुहुर्मुहुः । ताम्यमानस्तु कृच्छ्रेण सन्निपातेन मेहति ।। रक्तज मूत्रकृच्छ्र का लक्षण—रक्तज मूत्रकृच्छ्र पैत्तिकमूत्रकृच्छ्र के समान लक्षणों वाला होता है तथा इसमें मूत्र में रक्त आता है। चरक चि. अ. २६ में कहा है—क्षताभिघातात्क्षतजं क्षयाद्वा प्रकोपितं बस्तिगतं विबद्धम्। तीव्रार्ति मूत्रेण सहाल्पमल्पमायाति तस्मिन्नतिसञ्चिते च ।। आध्माततां विन्दति गौरवं च बस्तिर्लघुत्वं च विनिःसृतेऽस्मिन् ।।
विशेषाः सन्निपातोत्थे मूर्च्छाभ्रमविलापकाः ।। सर्वेषु कार्श्यमरतिरुचिः सानवस्थितिः । तृष्णाशूलविषादातिस्त एव स्युरुपद्रवाः ।।
सन्निपातज मूत्रकृच्छ्र में मूर्च्छा, भ्रम तथा प्रलाप-विशेष लक्षण होते हैं सब प्रकार के मूत्रकृच्छ्रों में कृशता, अरति (ग्लानि) अरुचि, मन की अस्थिरता, तृष्णा, शूल, विषाद, अर्ति(पीडा) आदि उपद्रव (लक्षण) होते हैं।
वक्तव्य—इस प्रकार यहां १. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४. वातपैत्तिक ५. वातश्लैष्मिक ६. पित्तश्लैष्मिक ७. सान्निपातिक ८. रक्तज—ये आठ भेद दिये हैं। चरक में-१. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४ सान्निपातिक ५. अश्मरीज ६. शर्कराज ७. शुक्रज ८. रक्तज-ये आठ भेद दिये हैं। सुश्रुत में—१. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४. सान्निपातिक ५. अभिघातज ६. पुरीषज ७. अश्मरीज तथा ८. शर्कराज—ये आठ भेद दिये हैं।
चिरात् प्रमेहाः कुप्यन्ति सद्यः कृच्छ्राणि देहिनाम् । विशेषः कृच्छ्रमेहानां कृच्छ्रे दाहोऽति चेन्द्रिये ।। कृच्छ्राण्याशु निवर्तन्ते प्रमेहास्तु प्रसङ्गिनः । पित्तप्रायाणि कृच्छ्राणि वातस्थानाश्रयाणि च ।।
प्रमेह तथा मूत्रकृच्छ्र में भेद—प्राणियों में प्रमेह रोग बहुत देर से प्रकुपित होते हैं जब कि मूत्रकृच्छ्र शीघ्र ही कुपित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त मूत्रकृच्छ्र तथा प्रमेह में यह भेद है कि मूत्रकृच्छ्र रोग में मूत्रेन्द्रिय में अत्यन्त दाह होता है। मूत्रकृच्छ्र रोग शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं तथा प्रमेह धीरे २ ठीक होता है। मूत्रकृच्छ्र में पित्त की प्रधानता है तथा वायु के स्थान इसके आश्रय होते हैं ।।
तस्मात् सामान्ययोगेन चिकित्सा ह्युपदेक्ष्यते ।
इसलिये दोनों की चिकित्सा समानरूप से कही जायेगी।