काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १७७
चिकित्सा (Local application) भी करनी चाहिये। उस स्थान को अच्छी प्रकार स्वेदन कर के कूर्चशस्त्र (Scraper) से अच्छी प्रकार लेखन (Scrape) करे जिससे रक्त का उत्क्लेश कम हो जाय। इस प्रकार शुद्धि हो जाने के बाद आवश्यकतानुसार लेप लगाने चाहियें। लेप लगाने से पूर्व उपर्युक्त स्थानिक तथा आशय संबन्धी शुद्धि करना आवश्यक है। कुष्ठ रोग में आभ्यन्तरिक एवं बाह्य सब प्रकार से विडङ्ग तथा खदिर का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—पानाहारविधाने प्रसेचने धूपने प्रदेहे च। कृमिनाशनं विडङ्गं विशिष्यते कुष्ठहा खदिरः॥ श्वित्र चिकित्सा—श्वित्र रोग में सब से पहले वमन विरेचना आदि द्वारा रोगी के आशय का शोधन करने के बाद सवर्णीकरणलेपों का प्रयोग करना चाहिये। तथा अन्य जो भी कुष्ठनाशक प्रयोग हैं उनका व्यवहार करना चाहिये।
मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ।
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कटीस्कन्धातिधिरणात् पित्तं क्रुद्धं कफानिलौ। अनुसृत्य यदा बस्तिं दूषयन्ति तदाश्रयाः ॥।
मूत्रकृच्छ्रं तदा जन्तोर्दारुणं संप्रवर्तते ।
वक्तव्य—यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। इसमें मूत्र कृच्छ्र रोग की चिकित्सा कही जायगी। मूत्र कृच्छ्र से अभिप्राय मूत्र के कष्ट पूर्वक आने से है।
मूत्र कृच्छ्र का निदान—कटि तथा स्कन्ध पर अत्यन्त अधिक भार के धारण करने से कुपित हुआ पित्त कफ तथा वायु का अनुसरण करके जब बस्ति (Bladder) को दूषित कर देता है तब उस प्राणी को भयंकर मूत्र कृच्छ्र रोग हो जाता है। चरक चि. अ. २६ में इस का निदान निम्न प्रकार से दिया है—व्यायाम तीक्ष्णौषधरूक्षमद्यप्रसङ्गनित्यद्रुतपृष्ठयानात्। आनूपमत्स्याध्यशनादजीर्णात्स्यूमूत्रकृच्छ्राणि नृणामिहाष्टौ ॥
सफेनमल्पमरुणं कालं वा शूलसंततम् ।।
मूत्रमानद्धवर्चस्त्वं वाताघातस्य लक्षणम्।
वातिक मूत्रकृच्छ्र के लक्षण—इसमें मूत्र फेन (झाग) वाला तथा थोड़ा २ आता है, रंग अरुण (ईंट जैसा लाल) तथा काल होता है, मूत्र त्याग के समय वेदना होती है, तथा मल भी रुक जाता है। चरक चि. अ. २६ में कहा है—तीव्रा हि रुग्वंक्षणबस्ति मेढ्रे स्वल्पं मुहुर्मूत्रयतीह वातात्। सुश्रुत उ. अ. ५९ में कहा है—अल्पमल्पं समुत्पीड्य मुष्कमेहनबस्तिभिः। फलद्भिरिव कृच्छ्रेण वाताघातेन मेहति ।।
सदाहवेदनं पीतमत्युष्णं बाष्पसंहितम् ।।
स्विद्यमानमुखो मूत्रं कुरुते पैत्तिके शिशुः।
पैत्तिक मूत्रकृच्छ्र के लक्षण—इसमें बालक को मूत्र दाह एवं वेदना से युक्त आता है, रंग अत्यन्त पीला होता है (पित्त के कारण), अत्यन्त उष्ण तथा वाष्प से युक्त होता है तथा मूत्र त्याग के समय मुख पर पसीना आ जाता है। चरक चि. अ. २६ में कहा है—पीतं सरक्तं सरुजं सदाहं कृच्छ्रान्मुहुर्मूत्रयतीह पित्तात्। सुश्रुत उ. अ. ५९ में भी कहा है—हारिद्रमुष्णं रक्तं वा मुष्कमेहनबस्तिभिः। अग्निना दह्यमानाभैः, पित्ताघातेन मेहति ।।