काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 534, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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काकण कुष्ठ का लक्षण—यह हाथी के चमड़े के समान खुरदरा होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—यत्काकणन्तिकावर्णमपाकं तीव्रवेदनम्। त्रिदोषलिङ्गं तत्कुष्ठं काकणं नैव सिध्यति ।। अर्थात् यह असाध्य माना गया है। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—काकणन्तिकावर्ण्यान्त्यादौ पश्चात्सर्वकुष्ठलिङ्गसमन्वितानि पापीयासं सर्वकुष्ठलिङ्गसंभवेनानेकवर्णानि काकणकानीति विद्यात्, तान्यसाध्यानि। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—'काकणन्तिकाफलसदृशाण्यतीवरक्तकृष्णानि । अर्थात् रत्ती के समान चारों ओर से अत्यन्त लाल तथा बीच में काला होने के कारण ही इसका यह नाम है। चर्मदल—यह वृद्धि वाला होता है—अर्थात् यह निरन्तर बढ़ता चला जाता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—रक्तं सकण्डुसस्फोटं सरुग् दलति चापि यत्। तच्चर्मदलमाख्यातं संस्पर्शासहमुच्यते ।। अर्थात् इसमें हाथ आदि के स्पर्श से तीव्र वेदना होती है। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—स्युर्येन कण्डूव्यथनौषचोषास्तलेषु तच्चर्मदलं वदन्ति। यह हाथों तथा पैरों की तलियों में होता है। इसे आधुनिक विज्ञान के अनुसार Zeroderma कहते हैं। एककुष्ठ—जो विसर्प से उत्पन्न हुआ हो, सदा विसर्पण करता हो (फैलता हो) तथा स्राव, वेदना एवं कृमियों से युक्त हो। चरक चि. अ. ७ में कहा है—अरवेदनं महावास्तु यन्मत्स्यशकलोपमम्। तदेककुष्ठं, .............. ।। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—कृष्णारुणं येन भवेच्छरीरं तदेककुष्ठं प्रवदन्ति कुष्ठम् ।। विपादिका का लक्षण—जो हाथ, पैर, अंगुष्ठ, ओष्ठ, तथा जङ्घाओं में फट जाता हो, जिसमें स्राव तथा वेदना होती हो तथा जिसका पाक न होता हो अर्थात् पकता न हो उसे विपादिका कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—वैपादिकं पाणिपादस्फुटनं तीव्रवेदनम्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—विपादिका पादगतेयमेव। डल्लण ने इसकी टीका में लिखा है—इयमेव विचर्चिका पादगता यदा स्यात्तदा विचर्चिकासंज्ञां विहाय विपादिकासंज्ञां प्राप्नोतीत्यर्थः'। अर्थात् जब विचर्चिका ही पैरों में हो तो उसे विपादिका कहते हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार इसे Rhagades कहते हैं। सभी रोग अज्ञान पूर्वक उपेक्षा किये जाने पर असाध्य हो जाते हैं तथा जो असाध्य होते हैं वे मनुष्यों को मार देते हैं अर्थात् वे घातक हो जाते हैं। इसलिये अपने हित को दृष्टि में रखते हुए शीघ्र ही प्रयत्नशील होना चाहिये अर्थात् यथा शीघ्र चिकित्सा का प्रयत्न करना चाहिये।
कुष्ठेष्वादौ वातोत्तरेषु घृताच्छपानमनेकशो मण्डान्तरितं प्रशस्यते, तिक्तसर्पिष इतरोत्तरयोः, वमनविरेचनास्था (पन)..........................................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके १२० तमं पत्रं^१म्)
वातिक कुष्ठ की चिकित्सा—वातिक कुष्ठों में सबसे पूर्व मण्ड से रहित अच्छ (स्वच्छ—केवल) घृत का पान कराना चाहिये। तथा पैत्तिक एवं श्लैष्मिक में तिक्त घृत—पिलाना, वमन, विरेचन, आस्थापन .......... (आदि का आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिये)
वक्तव्य—यह अध्याय बीच में ही खण्डित हो गया है। इसलिये अन्य आर्ष ग्रन्थों के आधार पर हम इन मुख्य २ कुष्ठों के सामान्य चिकित्सा क्रम का उल्लेख करते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—वातोत्तरेषु सर्पिर्वमनं श्लेष्मोत्तरेषु कुष्ठेषु। पित्तोत्तरेषु मोक्षो रक्तस्य विरेचन चाग्रे ।। अर्थात् वातिक कुष्ठ में घृत पान, पैत्तिक में रक्तमोक्षण अथवा विरेचन तथा श्लेष्मिक में वमन कराना चाहिये। आवश्यकतानुसार उपर्युक्त विधियों से कोष्ठ के शुद्ध हो जाने पर उसे वातप्रकोप से बचाने के लिये स्नेहपान कराना चाहिये। चरक चि. अ. ७ में कहा है—स्नेहस्य पानमिष्टं शुद्धे कोष्ठे प्रवाहिते रुधिरे। वायुर्हि शुद्धकोष्ठं कुष्ठिनमबलं विशति शीघ्रम् ।। इस सामान्य चिकित्सा (General treatment) के साथ ही स्थानिक
१. अस्याग्रे पत्रचतुष्टयात्मको ग्रन्थस्त्रुटितस्ताडपत्रपुस्तके।