भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १७५

सक्तगतिसमुत्थानभेदीनि परिमण्डलानि मण्डलकुष्ठानीति विद्यात्। (बन्धुपुष्प एक वृक्ष होता है जिसका फूल मध्याह्न में विकसित होता है इसे दुपहरिया (Pantapetes Phoenicea) कहते हैं। इसका फूल लाल रंग का होता है। रा. नि. में कहा है—अस्य पुष्पं मध्याह्ने विकसति पराह्ने च सूर्योदये शुष्यति। विषज कुष्ठ के लक्षण-मकड़ी, कीड़े, पतंगे, तथा सांप के दांतों से काटे हुए की यदि उपेक्षा की जाय तो वह स्थान खर (खुरदरा) हो जाता है-इसे विषज कुष्ठ कहते हैं यह कृच्छ्र साध्य होता है। पौण्डरीक कुष्ठ के लक्षण-जो बड़े आशय वाला एवं उन्नत हो, जो देर में उत्पन्न हो तथा देर में ही फटे, जो पुण्डरीक (रक्तकमल) तथा पलाश के वर्ण का हो उसे पौण्डरीक कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है-सश्वेतं रक्तपर्यन्तं पुण्डरीकदलोपमम्। सोत्सेधं च सरागं च पुण्डरीकं तदुच्यते ।। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—शुक्लरक्तावभासानि रक्तपर्यन्तानि रक्तराजीसन्ततान्युत्सेधवन्ति बहुबहलरक्तपूयलसीकानि कण्डूकृमिदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि पुण्डरीकपलाशसङ्काशानि पुण्डरीकाणीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—पुण्डरीक पत्रप्रकाशानि पौण्डरीकाणि श्लेष्मणा। श्वित्रकुष्ठ-श्वेत होने से इसे श्वित्र कहते हैं। इसके ५ प्रकारों का आगे वर्णन करेंगे। चरक में १८ प्रकार के कुष्ठों से भिन्न श्वित्रकुष्ठ का वर्णन किया है। इसे किलास भी कहा है। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है-‘‘किलासमपि कुष्ठविकल्प एव, तत्रिविधं वातेन, पित्तेन, श्लेष्मणा चेति’’। अर्थात् इन दोनों में भेद यह है कि कुष्ठ तो त्वचा, रक्त तथा मांस में अधिष्ठित होकर त्वचा में प्रकट होता है परन्तु इसके विपरीत किलास केवल त्वचा में ही अधिष्ठित होता है। कहा है—‘‘कुष्ठकिलासयोरन्तरं त्वग्गतमेव किलासमपरिस्रावि च’’। कुछ लोग त्वचा में स्थित होने पर उसे किलास कहते हैं तथा उसी के धातुओं में प्रवेश करने पर श्वित्र कहते हैं। कहा भी है—त्वग्गतन्तु यदस्रावि किलासं तत्रकीर्तितम्। यदा त्वचमतिक्रम्य तद्धातूनवगाहते ।। हित्वा किलाससंज्ञां च श्वित्रसंज्ञां लभेत तत् ।। चरक चि. अ. ७ में श्वित्र के ३ भेद दिये हैं—दारुणं चारुणं श्वित्रं किलासं नामभिस्त्रिभिः। यदुच्यते तत् त्रिविधं त्रिदोषं प्रायशश्च तत् ।। अर्थात् किलास (श्वित्र) के दारुण, चारुण और श्वित्र ये तीन भेद हैं। भालुकितन्त्र में भी धात्वाश्रय के भेद से किलास के तीनों भेद दिये हैं—वारुणं तत्तु विज्ञेयमांसधातुसमाश्रयम्। मेदः श्रितं भवेच्छ्वित्रं दारुणं रक्तसंश्रयम्। अर्थात् जब किलास का आश्रय मांस होता है तब उसका नाम वारुण (चरक के अनुसार चारुण) होता है। मेद में आश्रित होने पर श्वित्र तथा रक्त में आश्रित होने पर दारुण कहते हैं। यह रोग जैसा कि पहले कहा जा चुका है, केवल त्वचागत ही होता है। यहां दी हुई मांस मेद तथा रक्त धातुओं का यही अभिप्राय है कि दोष उन २ धातुओं में आश्रित रहता हुआ ही त्वचा में क्रमशः ताम्र, श्वेत तथा रक्तवर्णों को उत्पन्न करता है। अन्य कुष्ठों की तरह इसमें धातुसंबन्धी विशेष विकार उत्पन्न नहीं होते हैं। श्वित्र या किलास को आधुनिक विज्ञान के अनुसार Leuco derma कहा जा सकता है। ऋष्यजिह्व— जो ऋष्य (नीले अण्डकोष वाले हरिण) की जिह्वा के समान, कठोर, विवर्ण, गौरवर्ण एवं क्लेद से युक्त होता है उसे ऋष्यजिह्व कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—कर्कशं रक्तपर्यन्तमन्तःश्यावं सवेदनम्। यदृष्यजिह्वा संस्थानमृष्यजिह्वं तदुच्यते ।। इसी प्रकार चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—परुषाण्यरुणवर्णानि बहिरन्तः-श्यावानि नीलपीतताम्रावभासान्याशुगतिसमुत्थानान्यल्पकण्डूक्लेदकृमीणि दाहभेदनिस्तोदपाकबहुलानि शूकोपहतोपमवेदनान्युत्सन्नमध्यानि तनुपपर्यन्तानि कर्कशपिडकाचितानि दीर्घपरिमण्डलानि ऋष्यजिह्वाकृतीनि ऋष्यजिह्वानीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—ऋष्यजिह्वाप्रकाशानि खराणि ऋष्यजिह्नानि। कोई ऋष्य जिह्व के स्थान पर ऋक्षजिह्व पढ़ते हैं उस अवस्था में ऋक्ष का अर्थ रीछ करना होगा। शतारुष्क कुष्ठ का लक्षण—स्रावों से युक्त नीले, लाल, पीले, काले आदि अनेक वर्णों वाले कठोर व्रणों से युक्त होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—रक्तं श्यावं सदाहार्ति शतारुः स्याद् बहुव्रणम्। इसे Rupia कहते हैं। औदुम्बर कुष्ठ का लक्षण—जो पके हुए गूलर के फल के समान, बिना स्राव वाला तथा अनेक जड़ों (Roots) वाला होता है उसे औदुम्बर कुष्ठ कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—कण्डूविदाहरुग्रागपरीतं लोमपिञ्जरम्। उदुम्बरफलाभासं कुष्ठमौदुम्बरं विदुः ।। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—ताम्राणि ताम्रखररोमराजीभिरवनद्धानि बहलानि बहुबहलरक्तपूयलसीकानि कण्डूक्लेदकोथदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि ससन्तापकृमीणि पक्वोदुम्बरफलवर्णाण्युदुम्बरकुष्ठानीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है-“पित्तेन पक्वोदुम्बरफलाकृतिवर्णान्यौदुम्बराणि”।

३४ का.सं.

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