काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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तथा सुश्रुत में क्षुद्रकुष्ठ के रूप में दिया है। इस विरोध के निराकरण के लिये सुश्रुत की टीका में डल्हण ने लिखा है कि-‘सिध्मकुष्ठं द्विविधं–सिध्मं पुष्पिकासिध्मं च। पुष्पिकासिध्मस्य सुखसाध्यत्वात् सुश्रुते क्षुद्रकुष्ठेषु पाठः, सिध्मस्य दुःखसाध्यत्वाच्चरके महाकुष्ठ पाठ इत्यदोषः। अर्थात् सिध्मकुष्ठ के दो भेद हैं १ सिध्म २ पुष्पिका सिध्म। पुष्पिका सिध्म के सुख साध्य होने से उसके अनुसार सुश्रुत में इसे क्षुद्रकुष्ठों में दिया गया है तथा सिध्म के कष्टसाध्य होने के कारण चरक में इसे महाकुष्ठों में गिना गया है। इस ग्रन्थ में भी पुष्पिकासिध्म को दृष्टि में रखते हुए ही इसे साध्य कुष्ठों में दिया गया है। विचर्चिका का लक्षण—इसमें कृष्ण तथा लोहित (लाल) वर्ण के व्रण होते हैं जिसमें वेदना (पीडा) स्राव तथा पाक होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—सकण्डुपिडका श्यावा बहुस्रावा विचर्चिका। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—राजयोऽतिकण्ड्वर्तिरुजः सरूक्षा भवन्ति गात्रेषु विचर्चिकायाम्। कण्डूमती दाहरुजोपपन्ना॥ इसे अंगरेजी में (Pemphigus) कहते हैं। पामा का लक्षण–इसमें कण्डू, तोद, पाक, स्राव तथा छोटी २ फुन्सियां होती है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—पामा श्वेतारुणश्यावाः पिडका कण्डुला भृशम्। इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—सास्रावकण्डूपरिदाहकाभिः पामाऽणुकाभिः पिडकाभिरुह्याः॥ इसे आधुनिक विज्ञान के अनुसार (Eezema) कहते हैं। दद्रू का लक्षण—ये रूक्षता, कण्डू, दाह एवं स्राववाले मण्डलाकार तथा बढ़ने वाले होते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—सकण्डूरागपिडकं दद्रूमण्डलमुद्गतम्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—अतसीपुष्पवर्णानि ताम्राणि वा विसर्पिणि पिडकावन्ति च दद्रुकुष्ठानि। इसे (Ringworm) कहते हैं। दद्रुकुष्ठ को चरक में क्षुद्रकुष्ठों में तथा सुश्रुत में महाकुष्ठों में गिना गया है। सिध्म की तरह इसके भी सित तथा असित दो भेद हैं। असित (दद्रू) कुष्ठ के असाध्य होने से सुश्रुत में महाकुष्ठ में तथा सित के सुखसाध्य होने से इसका चरक में क्षुद्रकुष्ठों में परिगणन किया गया है। सुश्रुत नि. अ. ५ की टीका में डल्हण ने लिखा है—“दद्रुकुष्ठं द्विविधं सितमसितं च, असितस्य महोपक्रमसाध्यत्वादनुबन्धित्वप्रकर्षाच्च महाकुष्ठेषु मध्ये सुश्रुते पाठः, सितदद्रुकुष्ठस्य सुखसाध्यत्वादुत्तरोत्तरधात्वनुप्रवेशाभावत्ताऽत्यर्थपीडारहितत्वाच्च चरके क्षुद्रकुष्ठेषु मध्ये पाठ इत्यदोषः”। किटिभ का लक्षण–ये कृष्ण, श्याव एवं अरुण वर्ण वाले, खुरदरे, कठोर, स्रावयुक्त और बढ़ने वाले होते हैं। बड़े होते हैं, तथा एक बार शान्त होकर पुनः २ हो जाते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—श्यावं किणखरस्पर्शं परुषं किटिभं स्मृतम्। अर्थात् ये किण (Scar) के समान खुरदरे तथा कठोर होते हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—यत् स्रावि वृत्तं घनममुग्रकण्डु। तत् स्निग्धकृष्णं किटिभं (मं) वदन्ति॥ इसमें खुजली बहुत अधिक होती है, इसे (Psoriasis) कहते हैं। कपालकुष्ठ के लक्षण–यह कृष्ण वर्ण का, खुरदरा, कठोर तथा मैला, अनेक स्थानों वाला तथा मण्डलाकार होता है। इसमें खुजली होती है। दो ऋतुओं की सन्धियों (जहां दो ऋतुओं का मेल होता है–एक ऋतु समाप्त होती है तथा दूसरी प्रारंभ होती है) में और उष्णकाल में अत्यन्त कष्ट पहुंचता है। तथा कपाल (घड़े के ठीकरे) की आकृति वाला होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—कृष्णारुणकपालाभं यद्रूक्षं परुषं तनु। कपालं तोदबहुलं तत्कुष्ठं विषमं स्मृतम्॥ इसी प्रकार चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—रूक्षारुणपरुषाणि विषमविसृतानि. खरपर्यन्तानि तनून्युद्वृत्तबहिस्तनूनि सुप्तसुप्तानि हृषितलोमाचितानि निस्तोदबहुलान्यल्पकण्डूदाहपूल्यसीकान्याशुगतिसमुत्थानान्याशुभेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि कापालकुष्ठानीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—“कृष्णकपालिकाप्रकाशानि कपालकुष्ठानि”। स्थूलारुष्क या महारुष्क कुष्ठ का लक्षण–जो पिच्छा (चिपचिपापन), स्राव, वेदना, दाह, कण्डू, तोद, ज्वर, विसर्प (Erysipelas) तथा जो मूल में बड़े २ व्रणों से युक्त हो तथा मृदु एवं खुरदरा हो उसे महारुष्क कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—स्थूलानि सन्धिष्वतिदारुणानि। स्थूलारूषि स्युः कठिनान्त्यरुंषि॥ अर्थात् इसमें अत्यन्त दारुण एवं बड़े २ व्रण होते हैं। चरक में इसका परिगणन नहीं किया गया है। मण्डलकुष्ठ–इसमें दोपहरिया के फूलों के सदृश (लालरंग के) मण्डल होते हैं तथा दाह, कण्डू, वेदना और स्राव होते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—श्वेतं रक्तं स्थिरं स्त्यानं स्निग्धमुत्सन्नमण्डलम्। कृच्छ्रमन्योन्यसंसक्तं कुष्ठं मण्डलमुच्यते॥ अर्थात् इसमें मण्डल परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—स्निग्धानि गुरूण्युत्सेधवन्ति श्लक्ष्णस्थिरपीनपर्यन्तानि शुक्लरक्तावभासानि शुक्लरोमराजीसन्तानानि बहुबहलशुक्लपिच्छिलस्रावीणि बहुक्लेदकण्डूकृमीणि