काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 538, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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कनीयसीं पञ्चमूलीं कुलत्थं बदराणि च ।।
शर्करामधुसंयुक्तो लेहो मूत्रग्रहे हितः ।
स्वल्प पञ्चमूल (शालिपर्णी, पृश्निपर्णी, वृहती, कण्टकारी तथा गोखुरु), कुलत्थ तथा बेर–इनका शर्करा एवं मधु से अवलेह बनाकर मूत्रग्रह (मूत्रकृच्छ्र) में देना चाहिये ॥
ससैन्धवो रसः कार्यो मूत्राघाते घृतायु(न्वि)तः ।।
सतार्णपञ्चमूलो वा रास्नागोक्षुरकेण वा ।
पञ्चतृण मूल के रस में नमक एवं घृत मिलाकर अथवा रास्ना एवं गोखुरु के साथ मूत्रकृच्छ्र में देना चाहिये ॥
द्वौ करञ्जौ निर्गर्भा(?)च कार्पासो मधुशिग्रुकः ।।
श्वदंष्ट्रा वसुकौ द्वौ च मृणालं चोत्पलानि च ।
पिप्पल्यः सैन्धवं चैव सूक्ष्मैला मरिचानि च ।।
एतैः सिद्धां पिबेद्वालो यवागूं ससुवर्चलाम् ।
दोनों करञ्ज (करञ्ज तथा पूतिकरञ्ज) निर्गर्भा ?, कपास, मीठा सुहांजना, गोखरु, दोनों कुटज (मीठा और कड़वा) मृणाल (कमलनाल), उत्पल (नील कमल), पिप्पली, सैन्धा नमक, छोटी इलायची, मरिच, तथा सुवर्चला (हुलहुल) इन से सिद्ध की हुई यवागू को बालक पीये ॥
एतैरेवौषधैर्लेहं शर्करामधुसंयुक्तम् ।।
प्रयुञ्जीत घृतं चैव पक्वं कृच्छ्रनिवारणम् ।
इन्हीं उपर्युक्त ओषधियों से शर्कर एवं मधु के साथ अवलेह बनाकर अथवा घृत पाक करके प्रयोग करने से मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होता है ॥
कनीयसी पञ्चमूली पञ्चकोलयवैः सह । कुलत्थमधुशिग्रूणि कार्यश्च सतिलो भवेत् ।।
मन्दस्नेहो रसस्त्वेष सौवर्चलयुतो भवेत् । मूत्राघाते प्रयोक्तव्यः शर्करासु विशेषतः ।।
लघु पञ्चमूल, पञ्चकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक सोंठ), जै, कुलत्थ, मीठा सुहांजना, तथा तिल–इनके रस में थोड़ा स्नेह (घृत) तथा सौवर्चल (काला नमक) मिलाकर मूत्राघात (मूत्रकृच्छ्र) तथा विशेषरूप से शर्करा (शर्कराजन्य मूत्रकृच्छ्र) में प्रयुक्त करना चाहिये ॥
एकत्रिदोषजैः कृच्छ्रैः शर्करास्तुल्यलक्षणाः । सुवर्णचूर्णसदृशास्तथा सर्षपसन्निभाः ।।
रोचनेव गवां पित्ते संभवन्त्यनिलात्मनाम् । वातेनोन्मथितं मूत्रं खजितं पापकर्मणाम् ।।
शर्कराः स्युर्विबृद्धास्ता अश्मर्यः संभवन्त्यथ ।
जिस प्रकार गौ के पित्त (Bile) में क्रमशः गोरोचना बन जाती है उसी प्रकार वात की अधिकता वाले व्यक्तियों में एक दोषज अथवा त्रिदोषज मूत्रकृच्छ्रों से पापकर्म वाले व्यक्तियों में वायु के द्वारा मथा जाता हुआ मूत्र शर्करा के समान लक्षणवाली सुवर्ण के चूर्ण तथा सरसों के समान शर्करा (Sand) उत्पन्न कर देता है । तथा वे ही शर्करायें बढ़कर अश्मरियाँ (Stones) बन जाती हैं । चरक चि. अ. २६ में कहा है—‘‘क्रमेण पित्तेष्विव रोचना गोः’’ सुश्रुत नि. अ. ३ में अश्मरी किस प्रकार बनती है इसका एक अन्य उदाहरण दिया है—अप्सु स्वच्छा (स्था) स्वपि यथा निषिक्तासु नवे