काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १८१
घटे। कालान्तरेण पङ्कः स्यादश्मरीसंभवस्तथा॥ अर्थात् घड़े में रखे हुए साफ पानी में भी जिस प्रकार कुछ समय के पश्चात् कीच (Precipitate) जमा हो जाता है उसी प्रकार बस्ति में स्थित मूत्र में अश्मरी बनती है। इस विषय में आधुनिक विद्वानों की भी यही राय है। वृक्कस्थ नालियों द्वारा जब मूत्र में यूरिक एसिड, Urates, oxalate, phosphates आदि लवण मात्रा में उत्पन्न होते हैं। मूत्रस्थ जलीयांश में इनका विलयन होना असंभव हो जाता है। और इनका कुछ अंश सूक्ष्म Crystals के रूप में बस्ति या गुदों में अवलिप्त हो जाता है और उसके चारों ओर अन्य लवण एकत्रित होने लगते हैं तथा धीरे २ अश्मरी बनजाती है। कभी २ ये लवण सूखी हुई श्लेष्मा, सूखे रक्त या कृमियों के अण्डों पर भी एकत्रित हो जाते हैं। यदि मूत्र की प्रतिक्रिया (Reaction) अम्लीय होगी तो (Uric acid) और उसके लवण निक्षिप्त होंगे तथा प्रतिक्रिया क्षारीय होने पर (Phosphate) निक्षिप्त होंगे। अश्मरी का केन्द्र (Nucleus) प्रायः शुष्क श्लेष्मा होता है। इसीलिये सुश्रुत नि. अ. ३ में कहा है—'चतस्रोऽश्मर्यः भवन्ति श्लेष्माधिष्ठानाः'। आयुर्वेद के मतानुसार अश्मरियां चार प्रकार की होती हैं १ वातज २ पित्तज ३ कफज ४ शुक्रज। इनमें से बालकों को प्रथम तीन तथा वृद्धों में अन्तिम अर्थात् शुक्रज अश्मरी होती है। पाश्चात्य विज्ञान में रासायनिक संगठन के अनुसार अश्मरियों के भेद किये गये हैं। श्लैष्मिक अश्मरी को हम रंग रूप आदि के अनुसार Phosphatic calculus कह सकते हैं। यह श्वेत एवं चिकनी होती है। पैत्तिक अश्मरी को Uric acid calculus कहा जा सकता है—इसका रंग कुछ लाल भूरा सा होता है। वातिक अश्मरी को हम Oxalate calculus कह सकते हैं। इसका रंग कुछ काला होता है। यह कठोर होती है तथा खुरदरी होती है। इसमें नोकीले उभार बने होते हैं। यह रोगी को अत्यन्त पीडा देती है। अश्मरियों के अनेक कारण होने पर भी आयुर्वेद में इसके मुख्य कारण दो माने गये हैं। १ शोधन का अभाव तथा २ आहार विहार का अपथ्य॥
तदेतल्लक्षणं तासां नित्यमेव तु वेदना ।।
शर्करा सहमूत्रेण निर्धावत्यपि कस्यचित् । शल्यवत्यश्मरी बस्तौ वर्धमानाऽवतिष्ठते ।।
क्षीयते क्षीयमाणस्य पुष्यमाणस्य पुष्यति ।
अश्मरी तथा शर्करा के लक्षण-नित्य वेदना होती है किसी २ के मूत्र के साथ शर्करा (Sand) आती है। वह शल्यरूप अश्मरी बस्ति (Bladder) में वृद्धि को प्राप्त होती जाती है। वह अश्मरी ज्यों २ रोगी क्षीण होता जाता है-त्यों २ क्षीण होती जाती है तथा रोगी की पुष्टि के साथ २ अश्मरी भी पुष्ट होती जाती है अर्थात् बढ़ती जाती है। सुश्रुत नि. अ. ३ में अश्मरी होने पर निम्न लक्षण दिये हैं—अथ जातासु नाभिबस्तिसेवनीमेहनेष्वन्यतमस्मिन् मेहतो वेदना मूत्रधारासङ्गः सरुधिरमूत्रता मूत्रविकिरणं गोमेदकप्रकाशमत्याविलं ससिकतं विसृजन्ति धावनलङ्घनप्लवनपृष्ठयानोषणाध्वगमनैश्चास्य वेदना भवन्ति। अर्थात् मूत्र त्याग के समय नाभि, बस्ति, शिश्न, सीवनी आदि में वेदना, मूत्र का बीच २ में रुक जाना, मूत्र में रक्त आना, तथा दौड़ने चलने आदि से बस्ति में पीड़ा होती है। अष्टाङ्गहृदय में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—सामान्यालिङ्गं रुङ्नाभिसेवनीवस्तिमूर्धसु । विशीर्णधारं मूत्रं स्यात्तयामार्गनिरोधने ।। तद्व्यापायात्सुखं मेहेदच्छं गोमेदकोपमम् । तत्सक्षोभात् क्षते सास्त्रमायासाच्चाति रुग्भवेत् ।।
तस्मान्न नित्यं रुजति तस्योद्धरणमिष्यते ।।
अश्मर्युद्धरणं तीक्ष्णमौषधं स्त्रोत ईरणम् । साहसादतिबालेषु सर्वं नेच्छति कश्यपः ।।
इसलिये रुग्ण अवस्था में अश्मरी (पथरी) को नहीं निकालना चाहिये। उस अवस्था में स्त्रोतों को प्रेरित करने वाली तीक्ष्ण ओषधियों से भी अश्मरी का उद्धरण नहीं करना चाहिये। तथा महर्षि कश्यप के मत में अत्यन्त छोटे बालक में साहसपूर्वक अश्मरी को बिलकुल नहीं निकालना चाहिये। सुश्रुत चि. अ. ७ में अश्मरी का निम्न चिकित्सा सूत्र दिया