काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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है—औषधैस्तरुणः साध्यः प्रवृद्धश्छेदमर्हति। तस्य पूर्वेषु रूपेषु स्नेहादिक्रम इष्यते ।। अर्थात् यदि अश्मरी के अभी पूर्वरूप ही है या अश्मरी अभी प्रारंभ ही हुई है तो स्नेहन आदि के क्रम के बाद भिन्न २ अश्मरीघ्न (Lithotrite) ओषधियों के प्रयोग से वह बस्ति में स्वयं घुलकर मूत्र के साथ शर्कराूप में बाहर निकल आती है। परन्तु यदि वह बहुत प्रवृद्धावस्था में पहुंच चुकी हो तो उसे शस्त्रकर्म द्वारा ही निकालना पड़ता है। सुश्रुत में कहा है—घृतैः क्षारैः कषायैश्च क्षीरैः सोत्तरबस्तिभिः । यदि नोपशामं गच्छेच्छेदस्तत्रोत्तरोविधिः ।।
इति ह स्माह भगवान् (कश्यपः) ।
(इति चिकित्सास्थाने मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ॥)
(इति ताडपत्रपुस्तके १२५ तमं पत्रम् ।)
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति चिकित्सास्थाने मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः)
अथ द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ?
अथातो द्विव्रणीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम द्विव्रणीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
वक्तव्य—इस अध्याय में दो प्रकार के (अर्थात् दो प्रकार के कारणों–निज तथा आगन्तु–से उत्पन्न हुए) व्रणों तथा उनकी चिकित्सा का वर्णन किया गया है। इसलिये इसका यह नाम है। सुश्रुत चिकित्सास्थान प्रथम अध्याय में लिखा है—तत्र तुल्ये व्रणसामान्ये द्विकारणो थानप्रयोजनसामर्थ्याद् ‘द्विव्रणीय' इत्युच्यते। इसकी व्याख्या करते हुए डल्लण ने लिखा है–व्रणसामान्यं व्रणजातिर्व्रणत्वमित्यर्थः, तस्मिंस्तुल्ये सत्यपि द्विकारणोत्थानप्रयोजनसामर्थ्याद् 'द्विव्रणीय' इत्युच्यते; । द्विकारणं द्विहेतुकं यदुत्थानमुत्पत्तिः तस्य प्रयोजनं शीतक्रियादि, तस्य सामर्थ्य शक्तिः, तस्माद् 'द्विव्रणीय' इत्युच्यते ॥१-२॥
सूत्रस्थाने भगवता द्वौ व्रणौ परिकीर्तितौ । तयोर्विस्तरमिच्छामि श्रोतुं लक्षणमेव च ।।३।।
अनुग्रहाय बालानां चेष्टाहारौषधानि च । इति पृष्टः स शिष्येण संपूज्याह प्रजापतिः ।।४।।
भगवान् सूत्र स्थान में आपने दो प्रकार के व्रणों का उल्लेख किया था। बालकों के अनुग्रह की दृष्टि से उनके लक्षण, चेष्टा, आहार तथा ओषधि आदियों को मैं विस्तार–पूर्वक सुनना चाहता हूँ। इस प्रकार पूजा करके शिष्य द्वारा पूछे जाने पर प्रजापति–कश्यप ने कहा ।।३-४।।
परतन्त्रस्य समयं प्रब्रुवन्न च विस्तरम् । न शोभते सतां मध्ये लुब्धः काक इवाचितः ।।५।।
अवश्यं भिषजा त्वेतज्ज्ञातव्यमनसूयया । तस्मात् समयमात्रं भो शृणु बालहितेप्सया ।।६।।
परतन्त्र (अन्य प्रस्थान) के विषय में संक्षेप से ही कहना चाहिये। उसके विषय में विस्तार पूर्वक कहने वाला व्यक्ति पूजा किये गये लोभी कौए की तरह सज्जनों के बीच में शोभा नहीं देता। तथापि असूया (दूसरे के गुणों में दोषों को