भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः २ ] चिकित्सास्थानम् १८३

ढूंढ़ना) न करते हुए वैद्य को इस विषय में भी ज्ञान अवश्य होना चाहिये। इसलिये बालकों के हित की दृष्टि से इस विषय का संकेत मात्र मेरे से सुन ॥५-६॥

अथ खलु द्वौ व्रणौ निजश्चागन्तुश्च। निजो वाता द्यैकैकसर्वद्वन्द्वजः। क्षतभङ्ग(ग्न)विद्धपाटित-दग्धच्छिन्ननिष्पिष्टाभिरू (लू) नशस्त्रतृणकाष्ठाग्निविषदन्तनखशापमन्त्रमूलकर्मादिज आगन्तु। तस्य निजवदेव लक्षणमौषधं च स्वतर्केणानुविदध्यात् ।।७।।

निज और आगन्तु भेद से व्रण दो प्रकार के होते हैं। इनमें से निज व्रण वातादि दोषों से पृथक् २, सर्वज (त्रिदोषज) तथा द्वन्द्वज होते हैं। तथा आगन्तु व्रण क्षत भग्न (टूटना), विद्ध (बींधा जाना), पाटन (भेदन), दग्ध (जलना), छिन्न, निष्पिष्ट (पिस जाना), अभिलून (काटा जाना) तथा शस्त्र, तृण, काष्ठ, अग्नि, विष, दांत, नाखून, शाप, मन्त्र, मूल आदि कर्मों से उत्पन्न होते हैं। इन आगन्तु व्रणों के लक्षण तथा ओषधि अपनी बुद्धि के अनुसार निज के समान ही समझें। सुश्रुत चि. अ. १ में कहा है—द्वौ व्रणौ भवतः शारीर आगन्तुश्चेति। तयोः शारीरः पवनपित्तकफशोणितसन्निपातनिमित्तः, आगन्तुरपि पुरुषपशुपक्षिव्यालसरीसृपप्रपतनपीडनप्रहाराग्निक्षारविषातीक्ष्णौषधशकलकपालशृङ्गचक्रेषु परशुशक्ति कुन्ताद्यायुधाभिघातनिमित्तः। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—स च द्विविधो निज आगन्तुश्च। तत्र निजो दोष समुत्थः। आगन्तु शस्त्रानुशस्त्रो पललगुडनखदशनविषाणविषारुष्करादि निमित्तः। यहां शारीर से अभिप्राय निज व्रण से है। निज व्रण को सुश्रुत में वातादि दोषों के अतिरिक्त रक्तज भी माना है। आगन्तु व्रणों की भी औषध तथा लक्षण आदि निज व्रण के समान ही होते हैं क्योंकि उनका प्रत्यक्ष हेतु भिन्न होने पर भी पीछे से इनमें वातादि दोषों का अनुबन्ध हो जाने से वे निज व्रण ही हो जाते हैं। चरक चि. अ. २५ में कहा है—व्रणानां निजहेतूनामागन्तूनामशाम्यताम् । कुर्याद्दोषबलावेक्षी निजानामौषधं यथा ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—'सोऽपि पुनर्वातादिभिरधिष्ठितो निजतां लभते। सुश्रुत चि. अ. १ में भी कहा है—उत्तरकालं तु दोषोपप्लवंविशेषाच्छारीरवत् प्रतीकारः ॥७॥

स्तम्भकाठिन्याल्पस्त्रावशूलतोदस्फुरणकषायास्यत्वैर्वातिकं विद्यात्, ज्वरदाहमोहतृष्णाशुपाकलौहित्याव-दारणारुचिदौर्गन्ध्यैः पैत्तिकं विद्यात्, स्तैमित्यशैत्यमार्दवमन्दवेदनास्नेहपाण्डुवचिरकारित्वातिस्रावैः कफजं विद्यात्, सर्वरूपं सान्निपातिकं, द्विदोषं संसृष्टं विद्यात् ।।

वातिक व्रण के लक्षण—स्तम्भ (जकड़ना), कठिनता, अल्पस्त्राव, शूल, तोद (सूचीव्यधनवत् पीडा), स्फुरण, मुख का कसैला स्वाद होना-इन लक्षणों से व्रण को वातिक जाने। चरक चि. अ. २५ में कहा है—स्तब्धः कठिनसंस्पर्शो मन्दस्रावोऽतितीव्ररुक्। तुद्यते स्फुरति श्यावो व्रणो मारुतसंभवः ॥ अष्टाङ्ग संग्रह उ. अ. २९ में कहा है—तत्र श्यावोऽरुणः कृष्णो भस्मास्थिकपोतगलाव्यतमवर्णो वा दधिमस्तुक्षाराम्बुमांसधावनपुलाकोदकनिभाल्पस्त्रावो रूक्षश्चटचटायमानशीलोऽ-कस्माद्विविधशूलस्फुरणायामततोदभेदस्वापबहुलो निर्मोसिश्च वातात्। सुश्रुत चि. अ. १ में भी कहा है—तत्र श्यावारुणाभास्तनुः शीताः पिच्छिलोऽल्पस्रावी रूक्षश्चटचटायमानशीलः स्फुरणायामततोदभेदवेदनावहुलो निर्मोसिश्चेति वातात्। पैत्तिक व्रण के लक्षण—ज्वर, दाह, मोह, तृष्णा, आशुपाक (व्रण का शीघ्र पकना), लालिमा, अवदारण, (व्रण का विदीर्ण होना), अरुचि तथा दुर्गन्धि-इन लक्षणों से व्रण को पैत्तिक जाने। चरक चि. अ. २५ में कहा है—तृष्णामोहज्वरक्लेददाहदुष्टत्वदारणैः। व्रणं पित्तकृतं विद्याद्गन्धैः स्रावैश्च पूतिकैः ॥ अष्टांग संग्रह उ. अ. २९ में कहा है—क्षिप्रजः पीतनीलहरितकृष्णकपिलपिङ्गलो गोमूत्रभस्मशङ्खकिंशूकोदकमार्द्धीकतैलाभोष्णभूरिक्लेदो दाहोषार्ज्वररागपाकावदरणधूमयानान्वितः क्षारोक्षितक्षतोपमवेदनः पिटकाजुष्टश्च पित्तात्। सुश्रुत चि. अ. १ में भी कहा है—क्षिप्रजः पीतनीलाभः किंशुंकोदकाभोष्णस्रावी दाहपाकरागविकारी पीतपिडकाजुष्टश्चेति पित्तात्। श्लैष्मिक व्रण के लक्षण-स्तिमितता (चिपचिपा होना), शीतलता, मृदुता, मन्दवेदना, स्निग्धता, वर्ण में पाण्डु होना, चिरकारिता (देर में पकना) तथा स्राव की अधिकता इन लक्षणों से व्रण को श्लैष्मिक जाने। चरक चि. अ. २५