भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 569

फक्कचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २११

द्विःसंस्कृतं प्रयुञ्जीत सर्वयोगैर्विमुच्यते ।

इसी प्रकार रास्ना, मधु .... आदि औषधियों से यथा-विधि घृत, तेल, दूध, यूष या मांसरेस को दो बार संस्कार करके प्रयोग करने से सब रोग नष्ट हो जाते हैं॥

कफाधिकं चेन्मन्येत मूत्रमिश्रं पयः पिबेत् ।।
प्रयोगेण हिताशी च फक्करोगैर्विमुच्यते ।

यदि इस रोग में कफ की प्रधानता हो तो दूध में गोमूत्र मिलाकर पीना चाहिये। इसके प्रयोग तथा पथ्य सेवन से फक्क रोग दूर हो जाता है॥

एरण्डांशुमतीबिल्व .......................... ।।
........ शास्ते कार्या दशपलाः पृथक् । यवकोलकुलत्थानां प्रस्थं प्रस्थं समावपेत् ।।
अपां पचेच्चतुर्द्रोणे कषायं पादशेषितम् । तैलप्रस्थं दधिप्रस्थं कषायं च पुनः पचेत् ।।
तत् सिद्धं गोपयेद्यत्नात् सर्वथा संप्रयोजयेत् । बन्ध्यापङ्गु ............. ।।
........ ते इक्ष्वाकोः सुबाहोः सगरस्य च । नहुषस्य दिलीपस्य भरतस्य गयस्य च ।।
एतेन लेभिरे पुत्रा गतिमायुर्बलं सुखम् । राज्ञां पूर्वोपदेशाच्च राजतैलमिति स्मृतम् ।।
अनुग्रहप्रवृत्तौ हि राज्ञामासी ......... । ............................ प्रशस्यते ।।

राजतैल का प्रयोग—एरण्ड, अंशुमती (शालपर्णी) तथा बिल्व ...... आदि प्रत्येक १० पल। यव, कोल (बेर) तथा कुलत्थ १-१ प्रस्थ। जल ४ द्रोण। इन सबका क्वाथ करके चतुर्थांश शेष रखे। अब १ प्रस्थ तैल तथा १ प्रस्थ दही के साथ उपर्युक्त कषाय का पुनः पाक करे। तैल सिद्ध होने पर उसे यत्नपूर्वक सुरक्षित स्थान पर रखे। इसका सम्यक् प्रकार से प्रयोग करने से बन्ध्यात्व, पङ्गुत्व, आदि नष्ट होते हैं। इस तैल के प्रयोग से इक्ष्वाकु, सुबाहु, सगर, नहुष, दिलीप, भरत, गय आदि राजाओं के पुत्रों ने गति, आयु, बल तथा सुख को प्राप्त किया था। राजाओं को पहले उपदेश किया जाने से इसे राजतैल कहते हैं राजाओं के अनुग्रह के लिये इसका प्रयोग प्रशस्त माना गया है॥

त्रिचक्रं फक्करथकं प्राज्ञः शिल्पिकनिर्मितम् । विदध्यात्तेन शनकैर्गृहीतो गतिमभ्यसेत् ।।

उपर्युक्त चिकित्सा के अतिरिक्त बुद्धिमान वैद्य को किसी शिल्पी (बढ़ई-कारीगर) से एक तीन पहियों वाला फक्क रथ (Tricycle) बनवाकर उसके सहारे धीरे २ उस फक्क रोग से आक्रान्त बालक को चलने का अभ्यास कराना चाहिये॥

बस्तयः स्नेहपानानि स्वेदाश्चोद्वर्तनानि च । वातरोगेषु बालानां संसृष्टेषु विशे (षतः) ।।
............................. । ............ जन्तोः सुखाश्च शय्यासनबस्तियोगाः ।।

यदि इसके साथ में वात रोगों का संसर्ग हो तो उन बालकों को बस्ति, स्नेहपान, स्वेदन तथा उद्वर्तन (उबटन) आदि कराना चाहिये। ...... तथा उसे सुखकारी शय्या (चारपाई-बिस्तरा), आसन तथा बस्ति योगों का प्रयोग कराना चाहिये॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति (चिकित्सास्थाने) फक्कचिकित्सतम् ।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
इति (चिकित्सितस्थाने) फक्कचिकित्सितम् ।