काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् फक्कचिकित्सिताध्यायः ? ]
जिसकी माता गर्भिणी है ऐसे बालक ...... तथा अनाथ, दुष्ट ग्रहणी रोग वाले और प्रायः अधिक भोजन करने वाले बालक फक्क रोगी होते हैं इसलिये उनका खाया-पीया सब व्यर्थ हो जाता है। अग्नि के मन्द होने से तथा रस का उत्सर्ग होने से उन्हें मूत्र एवं पुरीष अधिक होता है ॥
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................................ कारयेत् क्रियाम् ।।
इन रोगियों में निम्न चिकित्सा करे ॥
कल्याणकं पिबेत् फक्कः षट्पलं वा यथाऽमृतम् ।
सप्तरात्रात् परं चैनं त्रिवृत्क्षीरेण शोधयेत् ।।
शुद्धकोष्ठस्ततः फक्कः पि ......... ।
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न तु ब्राह्मीघृतं शूद्रः पिबेत्तद्व्यस्य नाशनम् । प्रजाक्षयेण युज्यन्ते शूद्रा ब्राह्मीं पिबन्ति ये ।।
मृताः स्वर्गं न गच्छन्ति धर्मश्चैषां विलुप्यते ।
चिकित्सा—फक्कोरोगी कल्याणकघृत, षट्पलघृत अथवा अमृतघृत का पान करे। इससे स्नेहन हो जाने पर ७ दिन के बाद रोगी का त्रिवृत् क्षीर के द्वारा शोधन करे। कोष्ठ का शोधन हो जाने पर फक्कोरोगी (ब्राह्मीघृत) का सेवन करे।
....... परन्तु शूद्रों को ब्राह्मी घृत का सेवन नहीं करना चाहिये। इससे उसका नाश हो जाता है। जो शूद्र ब्राह्मी (घृत) का सेवन करते हैं उनकी सन्तान का क्षय (नाश) हो जाता है। वे मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग में नहीं जाते हैं तथा उनके धर्म का भी लोप हो जाता है ॥
दीप ............................................. ।।
.............................. । ........... ल्या वा रास्नया मधुकेन वा ।।
पुनर्नवैकपर्णीभ्यामेरण्डशतपुष्पयोः । द्राक्षापीलुत्रिवृद्भिर्वा शृतं क्षीरं प्रयोजयेत् ।।
एतानि त्वेव सर्वाणि संभृत्य मतिमान् भिषक् ।
....... तथा रास्ना, मुलहठी, पुनर्नवा तथा एकपर्णी, एरण्ड और सौंफ तथा द्राक्षा, पीलु और त्रिवृत् के द्वारा पकाये हुए दूध का प्रयोग करना चाहिये। बुद्धिमान् वैद्य को इन सबको एकत्र करके रखना चाहिये ॥
मांसस्य ............................................. ।।
.......... पुनर्यूषं संस्कृतं क्षीरमेव वा । शाल्यन्नेन सहाश्रीयात् पिबेत्तं चापि नित्यशः ।।
तेन प्राणं च लभते याति रोगैश्च मुच्यते । तेनैव तैलं विपचेत् फक्कानां सर्वथोदितम् ।।
इसके अतिरिक्त मांस ..... यूष तथा संस्कार किया हुआ दूध शालि अन्न के साथ नित्य सेवन करना चाहिये। इससे प्राणलाभ होकर रोग नष्ट हो जाते हैं। इन्हीं उपर्युक्त ओषधियों से ही तेल सिद्ध करके सम्पूर्ण फक्क रोगों में प्रयुक्त करना चाहिये ॥
रास्नामधु ............................. । ...... घृतं वा तैलं वा क्षीरं यूषमथो रसम् ।।