काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंफक्कचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २०९
हैं। बोलने की शक्ति उत्पन्न होने के बाद जो व्यक्ति बहरा होता है उसके विषय में यह सिद्धान्त लागू नहीं होता है। क्योंकि तब तक वह बोलना सीख चुका है। अब उसे कोई बात बोलने के लिये सुनने पर आश्रित नहीं रहना पड़ता जैसा कि बालक की बिलकुल प्रारंभिक अवस्था में होता है। यहां यह स्मरण रखना चाहिये कि वाणी (वाक्) शक्ति के नष्ट होने पर श्रवण शक्ति नष्ट नहीं होती है जैसा कि ऊपर मूल श्लोक में कहा गया है। अपितु इसके विपरीत श्रवण शक्ति के नष्ट हो जाने पर वाक्शक्ति नष्ट हो जाती है ॥८-९॥
क्षीरजं गर्भजं चैव तृतीयं व्याधिसंभवम्। फक्कत्वं त्रिविधं प्रोक्तं क्षीरजं तत्र वर्णितम् ।।१०।।
फक्क रोग तीन प्रकार का होता है। १. क्षीरज २. गर्भज तथा ३. व्याधिजन्य। इनमें से क्षीरज फक्क रोग का वर्णन कर दिया गया है ॥१०॥
गर्भिणीमातृकः क्षिप्रं स्तन्यस्य विनिवर्तनात्। क्षीयते म्रियते वाऽपि स फक्को गर्भपीडितः ।।११।।
गर्भज फक्कारोग—जिसकी माता गर्भिणी है—उसका दूध शीघ्र ही समाप्त हो जाने से अर्थात् गर्भ के कारण उसका दूध बन्द हो जाने से वह बालक क्षीण हो जाता है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है। यह गर्भ द्वारा पीडित फक्क रोग है ॥११॥
निजैरागन्तुभिश्चैव .......... रो ज्वरादिभिः। अनाथः क्लिश्यते बालः क्षीणमांसबलद्युतिः ।।१२।।
संशुष्कस्फिचबाहूरुर्महोदरशिरोमुखः। पीताक्षो हृषिताङ्गश्च दृश्यमानास्थिपञ्जरः ।।१३।।
म्लानाधरकायश्च नित्यमूत्रपुरीषकृत्। निश्चेष्टाधरकायो वा पाणिजानुगमोऽपि वा ।।१४।।
दौर्बल्यान्मन्दचेष्टश्च मन्दत्वात् परिभूतकः। मक्षिकाकृमिकीटानां गम्यश्चासन्नमृत्युरुकू ।।१५।।
विशीर्णहृष्टरोमा च स्तब्धरोमा महानखः। दुर्गन्धी मलिनः क्रोधी फक्कः श्वसिति ताम्यति ।।१६।।
अतिविण्मूत्रदूषिकाशिङ्घाणकमलोद्भवः। इत्येतैः कारणैर्विद्याद्व्याधिजां फक्कतां शिशोः ।।१७।।
व्याधिज फक्क रोग के लक्षण—निज तथा आगन्तु ज्वर आदि रोगों से अनाथ बालकों को क्लेश होकर उनका मांस, बल एवं द्युति (तेज) क्षीण हो जाता है। उस बालक के स्फिच् (नितम्ब–Buttocks), बाहु तथा जंघायें शुष्क हो जाती हैं तथा उदर (पेट), सिर और मुख बड़े हो जाते हैं, उसकी आंखें पीली हो जाती हैं, अङ्ग हर्ष (रोमहर्ष) युक्त होता है तथा शरीर केवल अस्थियों का पञ्जर (ढांचा) ही दिखाई देता है। उसका अधर काय (शरीर का निचला भाग) म्लान दिखाई देता है, उसका मूत्र एवं मल सदा निकलता रहता है अर्थात् Incontinance of urine and foeces हो जाता है) उसका निचला भाग निश्चेष्ट (Paralysed) हो जाता है तथा वह हाथों और घुटनों के बल चलता है। दुर्बलता के कारण उसकी चेष्टाएं मन्द हो जाती हैं तथा चेष्टाओं के मन्द हो जाने से मक्खियां, कृमि एवं कीड़े आदि उसे आक्रान्त करके शीघ्र मृत्यु कर देने वाले रोग उत्पन्न कर देते हैं। फक्क रोगी के रोम (बाल) विशीर्ण (सूखे हुए), हृष्ट तथा स्तब्ध होते हैं, उसके नख बड़े २ होते हैं तथा उसके पास से दुर्गन्धि आती है। वह मलिन एवं क्रोधी होता है तथा वह विशेष प्रकार से श्वास लेता है। मल-मूत्र की अधिकता, दूषित सिंङ्घाण (नासिका का मल) एवं मल आदि लक्षणों को देखकर बालक के व्याधिजन्य फक्क रोग को जाने ॥१२-१७॥
गर्भिणीमातृकेनैव .................. ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १३७ तमं पत्रम्।)
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......... मनाथानां विशेषतः। प्रदुष्टग्रहणीकाश्च प्रायशो बहुभोजिनः ।।
फक्का भवन्ति तस्माच्च भुक्तं तेषामपार्थकम्। मन्दाग्नित्वाद्व्रवो (सो) त्सर्गाद्बहुमूत्रपुरीषिणः ।।