भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 566

२०८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् फक्कचिकित्सिताध्यायः ? ]

वक्तव्य—रोग के लक्षणों को देखते हुए आधुनिक Ricket रोग से इसकी समानता है। अतः इसे बालकों का Ricket रोग कहा जा सकता है ॥१-२॥

बालः संवत्सरा(पन्नः)पादाभ्यां यो न गच्छति।
स फक्क इति विज्ञेयस्तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ॥३॥

एक वर्ष की अवस्था तक यदि बालक स्वयं अपने पैरों से न चल सके तो उस अवस्था को फक्क रोग कहते हैं। उसका मैं लक्षण कहूँगा ॥३॥

धात्री श्लैष्मिकदुग्धा तु फक्कदुग्धेतिसंज्ञिता।
तत्क्षीरपो बहुव्याधिः कार्श्यात् फक्कत्वमाप्नुयात् ॥४॥

क्षीरज फक्क के निदान, सम्प्राप्ति एवं लक्षण—जिस धात्री का दुग्ध श्लैष्मिक होता है उसे 'फक्कदुग्धा' कहते हैं। उस धात्री के दुग्ध का सेवन करने वाला बालक अनेक व्याधियों से आक्रान्त हो जाता है तथा कृशता के कारण उसे 'फक्कारोग' हो जाता है ॥४॥

पित्तानिलप्रकृतिकी पटुक्षीरा पटुप्रजा । कुतः पङ्गुजडा मूका त्रिदोषक्षीरभोजिनः ॥५॥

पित्त या वातप्रकृति वाली स्त्री, जिसका दुग्ध लवण युक्त हो तथा जिसके सन्तान अधिक हो-उसके दूध के सेवन से अथवा त्रिदोषज दूध के सेवन से बालकों में पङ्गुता, जड़ता तथा मूकता (Dumbness) आ जाती है ॥५॥

हृदयात् संप्रवर्तन्ते मनःपूर्वाणि देहिनाम् । इन्द्रियाणीन्द्रियावश्रौद्धा(?) ........ हितम् ॥६॥

हृदय से ये लक्षण मनसहित इन्द्रियों में पहुंचते हैं अर्थात् मन और इन्द्रियों में भी इस रोग का प्रभाव हो जाता है ॥६॥

तत्र वागिन्द्रियं त्वेकं द्विधा भिन्नं यथा करौ । अर्धेन शब्दं वदति गृह्णात्यर्धेन तं पुनः ॥७॥

इन इन्द्रियों में एक वाक् इन्द्रिय होती है। इसके हाथों के समान दो भाग होते हैं। अर्थात् जिस प्रकार मनुष्य के हाथ दो होते हैं उसी प्रकार वाक् इन्द्रिय के भी दो भाग होते हैं। उनमें से एक भाग के द्वारा वह बोलता है और दूसरे के द्वारा उसे पुनः ग्रहण करता है अर्थात् सुनता है ॥७॥

तस्माच्च मूका भूयिष्ठं भवन्ति बधिरा नराः ।
वाङ्मूलं हि स्मृतं श्रोत्रं वाग्भ्रंशे भ्रश्यते हि तत् ॥८॥
मूलं वाच्छोत्रं म......च्च बधिरो नरः । ब्रवीति मूले हि हते हतावा ........... ॥९॥

इसलिये जो बालक मूक (Dumb) होता है वह साथ ही प्रायः बधिर (बहरा-Deaf) भी होता है। श्रोत्र (श्रवणशक्ति) वाङ् मूल में स्थित होती है। इंसलिये वाणी (वाक्शक्ति) के नष्ट होने पर श्रवण शक्ति भी स्वयमेव नष्ट हो जाती है। इस प्रकार मूल के नष्ट होने पर व्यक्ति बधिर (बहरा) हो जाता है। क्योंकि मूल के नष्ट होने पर उसके आश्रित भाव भी नष्ट हो जाते हैं।

वक्तव्य—आधुनिक विद्वान् भी बोलने तथा सुनने का परस्पर घनिष्ठ संबन्ध मानते हैं। प्रारंभ में बालक को बोलना सिखाने के लिये आवश्यक है कि वह शब्दों को सुन सके। जिस व्यक्ति ने जो बात कभी सुनी नहीं है वह उसे निश्चित रूप से बोल भी नहीं सकता। एक बार सुनने के बाद ही वह बोल सकता है। इसलिये बोलने की शक्ति उत्पन्न होने से पहले जो बालक किसी कारण से बहरा (deaf) हो जाय वह बोल भी नहीं सकता। इसे Deaf-mutism कहते