भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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फक्कचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २०७

लोध्र, आंवला, मंजीठ, जायफल तथा नागकेसर को सूक्ष्म पीसकर एक आढक जल में डालकर रख दें। इसका सेवन करने से तृष्णा, छर्दि, अतिसार, मद, मूर्च्छा, प्रलाप, अनवस्थान (मन की अस्थिरता), अरुचि तथा ग्लानि दूर हो जाते हैं ॥४४-४५॥

लामज्जकमृणालत्वङ्मधुकान्युत्पलं तथा । पलं पलं गुडूच्या द्वे अष्टौ गुडपलानि तु ॥४६॥
जलाढके नवे भाण्डे गोपयेत् केशरान्वितम् । वातपित्तोत्तरं हन्ति मदं सोपद्रवं नृणाम् ॥४७॥

लामज्जक, मृणाल, दालचीनी, मुलहठी तथा उत्पल (नील कमल)-प्रत्येक १ पल। गिलोय-२ पल, गुड-८ पल तथा जल-१ आढक। इन्हें एक नये बर्तन में डालकर ऊपर से थोड़ी केसर मिलाकर किसी सुरक्षित स्थान पर रख दे। इसके प्रयोग से उपद्रवयुक्त वातिक एवं पैत्तिक मद नष्ट हो जाता है ॥४६-४७॥

लोकसिद्धानि चान्यानि पानकान्युपकल्पयेत् । समद्यान्यन्नपानानि भूयिष्ठं चोपपादयेत् ॥४८॥

अन्य भी जो लोक में प्रसिद्ध पानक हैं, उनका रोगी को प्रयोग कराये। तथा उसे मद्यसहित अन्नपान का पर्याप्त मात्रा में सेवन कराये ॥४८॥

अथानुबन्धं कुर्वीत स रोगी च बली भवेत् ।
यथादोषं ततस्तस्य कुर्यात् संशोधनं बुधः ॥४९॥

इसके साथ ही अनुबन्धरूप से कोई दूसरा रोग हो जाने पर यदि रोगी बलवान् है तो दोष के अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति उसका संशोधन करे ॥४९॥

मद्ययुक्तं त्रिवृच्चूर्णं पेयं स्यादनुलोमनम् । पानकेनाप्यवत् कार्यं समद्यगुडयुक्तया ॥५०॥

मद्य के साथ त्रिवृत् का चूर्ण देने से अनुलोमन हो जाता है। तथा मद्य एवं गुड मिले हुए पानक से भी यही प्रयोजन सिद्ध हो जाता है ॥५०॥

विसर्पदाहज्वरयोरेवं चोक्ता परिक्रिया । पिपासाज्वरदाहार्ते सैव कार्या मदात्यये ॥५१॥

विसर्प एवं दाह ज्वर में जो चिकित्सा कही गई है, मदात्यय रोग में पिपासा, ज्वर एवं दाह होने पर वही चिकित्सा करनी चाहिये ॥५१॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥५२॥
इति चिकित्सास्थाने पाना(मदा)त्ययचिकित्सितम् ॥

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥५२॥
इति चिकित्सास्थाने पाना (मदा) त्ययचिकित्सितम् ॥


फक्कचिकित्सिताध्यायः ।

अथातः फक्कचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम फक्कचिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।


३६ का.सं.