काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ? ]
पानात्यय रोग से पीड़ित रोगी को तक्र से अथवा गुड और चुक्र के साथ सिद्ध की हुई उपोदिका (पोई-पत्रशाकविशेष-Indian Spinach) अथवा अवक्षीरी देनी चाहिये ॥३४॥
यथालाभोपसंपन्नां पाययेत् सिद्धये भिषक् ॥३५॥
इन उपर्युक्त प्रयोगों में से जो २ भी वस्तुएँ मिल जांय उन्हें चिकित्सक रोगसिद्धि के लिये रोगी को पिलाये ॥३५॥
कानिचिद्भक्ष्यत्र भक्ष्याणि कानिचित् स्वादयेद् बुधः । जिघ्रेत् पश्येत् पिबेत् किञ्चिच्छ्रद्धाजननकारणात् ।।
जो भी उस रोगी के लिये भक्ष्य पदार्थ हों वे उसे अच्छी प्रकार खिलाये। जिस वस्तु में उसकी श्रद्धा (रुचि) हो उसे सूंघे, देखे तथा पीये ॥३६॥
सुखं चास्यानुजानीयादृतुयोग्यं यथाक्रमम् । यच्च यच्चानुशेतेऽस्य तत्तदेवोपचारयेत् ।।३७।।
प्रत्येक ऋतु के अनुसार उसके सुख या स्वास्थ्य को जानकर जो भी आहार-विहार आदि उसके अनुकूल हो उसका उसे सेवन कराये ॥३७॥
क्रमेण चास्य संसर्गमन्नपानेषु योजयेत् । दुकूलक्षौमकदलीपद्मपत्रादि सेवयेत् ।।३८।। चन्दनानि च मुक्तानि शीतानि विविधानि च।
उसे धीरे २ संसर्जन क्रम से अन्न एवं पान देवे। तथा दुकूल (उत्तरीय वस्त्र), क्षौम (रेशमी वस्त्र), कदली तथा कमल के पत्र, चन्दन तथा अनेक प्रकार के शीतल मोती आदि का प्रयोग करे। चरक चि. अ. २४ में कहा है— कुमुदोत्पलपत्राणां सिक्तानां चन्दनाम्बुना । हिताः स्पर्शा मनोज्ञानां दाहे मद्यसमुत्थिते ।। कथाश्च विविधाः शीताः शब्दाश्च शिखिनां शिवाः । तोयदानां च संशब्दाः शमयन्ति मदात्ययम् ।। जलयन्त्राभिवर्षीणि वातयन्त्रवहनि च । कल्पनीयानि भिषजा दाहे धारागृहाणि च ॥३८॥
उष्णानि त्वन्नपानानि रूक्षाणि च गुरूणि च ।।३९।। अग्निसूर्योपसेवांच दिवास्वप्नं विशोषणम् । शोकाध्वमैथुनायासान् व्यायामांश्च विवर्जयेत् ।।४०।। मण्डा यवाग्वो यूषाश्च न शस्यन्ते मदात्यये ।
मदात्यय रोग में अपथ्य—मदात्यय का रोगी उष्ण, रूक्ष तथा गुरु अन्न-पान, अग्नि तथा सूर्य (धूप) का सेवन, दिन में सोना, लङ्घन आदि द्वारा शोषण, शोक, मार्गगमन, मैथुन, अधिक परिश्रम तथा व्यायाम का त्याग कर दे तथा उसे मण्ड, यवागू एवं यूष का सेवन नहीं करना चाहिये ॥३९-४०॥
एवं चेन्नोपशाम्येत तत्रेमां कारयेत् क्रियाम् ।।४१।।
यदि इन उपर्युक्त उपचारों से भी मदात्यय रोग शान्त न हो तो उसमें निम्न चिकित्सा करनी चाहिये ॥४१॥
उशीरं तिन्तिडीकं च दाडिमस्वरसं मधु । पानात्यये पित्तकृते श्रेष्ठं तर्पणपानकम् ।।४२।।
पैत्तिक मदात्यय में खस, इमली तथा अनार के स्वरस में मधु मिलाकर देना श्रेष्ठ एवं तृप्तिकारक पानक है ॥४२॥
काश्मर्यं दाडिमं द्राक्षाः खर्जूराणि परूषकम् । दद्यात् कुडवशस्तानि लोध्रादीनि तु युक्तितः ।।४३।।
गम्भारी, अनारदाना, द्राक्षा, खजूर, फालसा तथा लोध्र आदि को युक्तिपूर्वक एक कुडवमात्रा में रोगी को देवे ॥४३॥
लोध्रामलकमञ्जिष्ठाः सूक्ष्मं पि(ष्ट्वा) ........ । तोयाढके प्लुतं स्थाप्यं सजाति वा सकेशरम् ।।४४।। तृष्णां छर्दिमतीसारमदमूर्च्छाविलापकम् । अनवस्थानमरुचिं ग्लानिं चैतदपोहति ।।४५।।