काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमदात्ययचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २०५
इत्येतैः कारणैर्दृष्ट्वा विदग्धमदपीडितम् । पाययेत्तर्पणं काले शीतं दाडिमवारिणा ।।२६।।
उपर्युक्त कारणों से रोगी को विदग्ध मद से पीडित जानकर उसे यथासमय अनार के रस के साथ शीतल तर्पण पिलाना चाहिये ॥२६॥
येनैव मद्येन भवेत् समुत्पन्नो मदात्ययः । तथैवोपहरैत् पातुं बहुशीतोदकान्वितम् ।।२७।।
कायाग्निस्तन्मयो ह्यस्य सिरा रसवहास्तथा । मनश्च भावितं तेन तस्मात्तद्ध्यस्य भेषजम् ।।२८।।
जिस मद्य के द्वारा ही रोगी को मदात्यय रोग उत्पन्न हुआ हो उसे बहुत अधिक तथा शीतल जल के साथ मिलाकर वही अर्थात् सजातीय मद्य पीने को देना चाहिये । क्योंकि उस मनुष्य की कायाग्नि, सिरा तथा रसवहा नाडियां तन्मय (उसी मद्य के ही अनुकूल) होती हैं तथा मन भी उसी (मद्य) से ही भावित (ओतप्रोत) होता है । इसलिये यही इसकी चिकित्सा है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—मिथ्यातिहीनपीतेन यो व्याधिरुपजायते । समपीतेन तेनैव स मद्येनोपशाम्यति ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह (चि. ७ अ. ७) में भी कहा है ।।
अथवा क्लान्तविक्लिष्टयथर्तुसुखवारिणा । स्नातानुलिप्तं प्रयतं मनोज्ञासनवेश्मगम् ।।२९।।
पाययेत्तर्पणं युक्त्या हृद्यपात्रोपनायकम् ।
अथवा थके हुए एवं क्लेशयुक्त रोगी को भिन्न २ ऋतुओं के अनुसार सुखकारक पानी से स्नान कराकर तथा चन्दन आदि का लेप करके प्रयत्नपूर्वक एवं सुन्दर आसन तथा घर में बैठे हुए को हृद्य (मन को अच्छे लगने वाले) बर्तनों में रखकर युक्तिपूर्वक तर्पण पिलाये ॥२९॥
सक्तवः पारणा हृद्या अथवा लाजसक्तवः ।।३०।।
विड्सौवर्चलाजाज्यः सुशीतं दाडिमोदकम् । तन्मद्यमल्पतक्रं च रूषिताः सक्तवोऽल्पशः ।।३१।।
अथवा उसे हृदय को अच्छे लगने वाले सत्तू, पारणा, लाजसत्तू (चावलों के सत्तू) देवे । तथा विड्नमक, सौवर्चल नमक (कालानमक) तथा अजाजी (जीरा) युक्त शीतल दाडिमोदक (अनार का रस) का मद्य बनाकर उसमें थोड़ा तक्र मिलाकर देवे अथवा थोड़े २ करके सत्तू देवे ॥३०-३१॥
कुठेरभूस्तृणक्षौद्रजम्बीरसुमुखादयः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १३६ तमं पत्रम्)
युक्ताम्लाः षाडवा मुख्याः पक्वापक्वाः सुगन्धिनः ।।३२।।
कुठेर (सितार्जक नामक श्वेत तुलसी भेद), भूतृण, मधु, जम्बीर (बिजौरा) तथा सुमुख (पर्णासभेद-बनबबरी) से युक्त एवं खट्टे, पक्व तथा अपक्व और सुगन्धित षाडव (अचार आदि) उसे देवे ॥३२॥
केशरं मातुलुङ्गानामार्द्रकं जीव(र)दाडिमम् । शर्करागुडखण्डानि जाङ्ग्लान्यामिषाणि च ।।३३।।
अम्लानम्लानि सिद्धानि संस्कृतानि विभागशः ।
उसे बिजौरे के केशर (पराग), आर्द्रक, जीरा, अनार, शर्करा तथा गुड़ के खण्ड (टुकड़े अथवा गुड और खाण्ड) तथा अम्ल (खट्टे) अनम्ल (जो खट्टे न हों) क्रमशः सिद्ध एवं संस्कृत किये हुए जांगल पशु-पक्षियों का मांस देवे ॥३३॥
उपोदिकां तक्रसिद्धां सिद्धां वा गुडचुक्रयोः ।।३४।।
एवंविधां त्ववक्षीरीं पानात्ययनिपीडितम् ।