काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 562, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २०४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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अरुचि, स्वेद तथा विष्टम्भ हो जाता है तथा रोगी अत्यन्त विह्वल हो जाता है और उसे अतिसार हो जाता है। उसका शरीर सूखजाता है, तथा वह अत्यन्त विलाप करता है। इन लक्षणों से मदात्यय रोग को जाने। अब मैं उनके (दोष भेद से पृथक् २) लक्षण कहूंगा॥
हृत्पार्श्वपर्वरुजनं प्रलापोऽतिप्रजागरः। उन्मत्त इव चाभाति पवनोत्थे मदात्यये ।।१९।।
वातिक मदात्यय के लक्षण—वातिक मदात्यय में रोगी के हृदय, पार्श्व तथा जोड़ों में दर्द होता है। रोगी प्रलाप (Delirium) करता है, वह अत्यन्त जागरण करता है (उसे निद्रा नहीं जाती) और वह उन्मत्त (पागल) की तरह प्रतीत होता है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—हिक्काश्वासशिरःकम्पपार्श्वशूलप्रजागरैः। विद्याद्बहुप्रलापस्य वातप्रायं मदात्ययम् ॥ सुश्रुत उ. अ. ४७ में कहा है—स्तम्भाङ्गमर्दहृदयग्रहतोदकम्पाः पानात्ययेऽनिलकृते शिरसो रुजश्च॥
स्रोतःपाको ज्वरो दाहो विड्भेदः स्वेदपीतता। छर्दि रक्तप्रकोपो वा पीतं पश्यति पैत्तिके ।।२०।।
पैत्तिक मदात्यय के लक्षण—पैत्तिक मदात्यय में रोगी के स्रोतों का पाक, ज्वर, दाह, विड्भेद (अतिसार), स्वेद (पसीने) का पीला होना, छर्दि एवं रक्तप्रकोप हो जाता है तथा उसे पीला दिखाई देता है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—तृष्णादाहज्वरस्वेदमूर्च्छातौसारविभ्रमैः। विद्याद्धरितवर्णस्य पित्तप्रायं मदात्ययम् ॥
आ............सेकच्छर्दिशीतज्वरालसाः। तन्द्रा स्तम्भो विसंज्ञत्वं विषादश्च कफात्मके ।।२१।। श्वासकासभ्रमोत्साहविड्भेदानाहवेपकाः। शूलमोहौ च सामान्यौ सर्वरूपस्तु सर्वजः ।।२२।।
श्लैष्मिक मदात्यय के लक्षण—श्लैष्मिक मदात्यय में सेक (कफप्रसेक), वमन, शीतज्वर, अलसरोग, तन्द्रा (आलस्य), स्तम्भ, संज्ञा का अभाव, विषाद, श्वास, कास, भ्रम, उत्साह, अतिसार, आनाह, कम्पन, शूल तथा मोह होते हैं। चरक च. अ. २४ में कहा है—छर्दिंरोचकहृल्लासतन्द्रास्तैमित्यगौरवैः। विद्याच्छीतपरीतस्य कफप्रायं मदात्ययम् ॥
त्रिदोषज मदात्यय सब रूपों वाला होता है अर्थात् उपर्युक्त सब लक्षण सम्मिलित होते हैं—सुश्रुत उ. अ. ४७ में कहा है—सर्वात्मके भवति सर्वविकारसम्पत् ।।
भूयिष्ठमामप्रभवं प्रवदन्ति मदात्ययम्। तस्मान्मदात्यये पूर्वं हितं लङ्घनमेव तु ।।२३।।
मदात्यय रोग को विशेषरूप से आमदोष से उत्पन्न हुआ माना जाता है। इसलिये मदात्यय रोग में सर्वप्रथम लङ्घन कराना हितकर माना गया है। चरक चि. अ. २४ में इसे त्रिदोषज मानकर ही चिकित्सा का विधान किया गया है—सर्वं मदात्ययं विद्यात् त्रिदोषमधिकं तु यम्। दोषं मदात्यये पत्येत् तमादौ प्रतिकारयेत् ॥ अर्थात् मदात्यय के त्रिदोषज होने पर भी जिस दोष की प्रधानता हो पहले उसकी चिकित्सा करनी चाहिये। अथवा वहीं पर ही पहले कफ दोष की चिकित्सा का विधान दिया है—कफस्थानानुपूर्व्या वा क्रिया कार्या मदात्यये। पित्तमारुतपर्यन्तः प्रायेण हि मदात्ययः ।। अर्थात् पहले कफ की चिकित्सा करें। उसके बाद क्रमशः पित्त और वायु की चिकित्सा करनी चाहिये ॥२३॥
प्रकाङ्क्षा लाघवं स्थैर्यमिन्द्रियाणां प्रसन्नता। रोगोपशान्तिर्वाक्शुद्धी रूपं सम्यग्विोषिते ।।२४।।
लङ्घन द्वारा आम दोष के सम्यक् प्रकार से शोषण हो जाने पर प्रकाक्षा (आहार की अभिलाषा), लघुता, स्थिरता, इन्द्रियों की प्रसन्नता, रोगों की शान्ति तथा वाणी की शुद्धि हो जाती है ॥२४॥
एतानि कृत्वा विकृतिं याति चातिविशोषणात्। असंप्राप्तिमतैतेषां जानीयात्तमलङ्घिते ।।२५।।
आम से अधिक शोषण होने पर उपर्युक्त लक्षणों के उत्पन्न होने के बाद उनमें विकार हो जाता है। तथा यदि लङ्घन कम हुआ हो अथवा ठीक तरह से न हुआ हो तो उपर्युक्त लक्षण उत्पन्न नहीं होते हैं ॥२५॥