काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंधात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २१३
...................................................................... । तीक्ष्णस्य बृंहणं नित्यं मन्दाग्नेर्दीपनक्रिया ।।
पथ्याशनं तु सततं विषमाग्नेः सुखावहम्। कल्याणकं षट्पलं वा प्रयोगेनोपयुज्यते ।।
यथाबलं यथायोगं पञ्चक .......... । ........................................................ ।।
................................................... ति यथाविधि ।
...... तीक्ष्ण अग्नि वाले पुरुष का सदा वृहण करना चाहिये। मन्दाग्नि का दीपन तथा विषम अग्निवाले को सदा पथ्य का सेवन कराना सुखकारक होता है। इनमें कल्याणघृत अथवा षट्पल घृत का प्रयोग करना चाहिये। तथा आवश्यकतानुसार बल को देखकर यथाविधि पञ्चकर्म करना चाहिये ।। ......
न तूपयोजयेत् क्षारं क्षारप्रायौषधानि वा ।।
प्रजाविनाशनः क्षारो धात्रीणां स न शस्यते ।
इनमें क्षार अथवा क्षारप्रधान ओषधियों का उपयोग नहीं करना चाहिये। क्षार सन्तान का नाश करने वाला होने से धात्रियों के लिये प्रशस्त नहीं माना गया है। चरक वि. अ. १ में भी क्षार का अधिक प्रयोग पुंस्त्वघातक कहा गया है—
क्षारः पुनरौष्ण्यतैक्ष्ण्यलाघवोपपन्नः क्लेदयत्यादौ पश्चाद्विशोषयति, स पचनदहनभेदनाथर्मुपयुज्यते; सोऽतिप्रयुज्यमानः केशाक्षिक्षहृदयपुंस्त्वोपघातकरः संपद्यते, ये ह्येनं ग्रामनगरनिगमजनपदाः सततमुपयुञ्जते ते ह्यान्ध्यषाण्ड्यखालित्यपालित्यभाजो हृदयापकर्तिनश्च भवन्ति, तद्यथा-प्राच्याश्चीनाश्च, तस्मात्क्षारं नात्युपयुञ्जीत ॥९॥
म्रक्षणोद्वर्त्तनस्नानं शुक्लाम्बरनिषेवणम् ।।
मृष्टमन्नं सुखा ..................... । ................................................ ।।
............. (ध)र्मरतिधार्त्रीणां सुखहेतवः ।
उनका म्रक्षण (मालिश), उद्वर्तन (उबटन), स्नान, शुभ्र (श्वेत) वस्त्रों का धारण करना तथा पवित्र अन्न (भोजन) ...... ये धात्री के धर्म, रति (भोगविलास) एवं सुख के कारण हैं ।।
मेदस्विनीनां धात्रीणां सिराकर्म प्रशस्यते ।।
तथा जो धात्री मेद (चर्बी) वाली अर्थात् स्थूल होती है उसका सिराकर्म (सिराव्यध) करना चाहिये ।।
स्नेहस्वेदोपपन्नानामूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् । ततः सा मेदसि क्षीणे स्त्रोतःसु विवृतेषु च ।।
.................................. । ................ यो रसः ।।
कृशां च नष्टपुष्पां च बृंहयेत्तेन सिद्ध्यति ।
स्नेहन एवं स्वेदन कराकर धात्री का ऊर्ध्व एवं अधः शोधन (वमन एवं विरेचन) कराना चाहिये। इससे वह मेद के क्षीण हो जाने से तथा स्रोतों के खुल जाने से ...... स्वस्थ हो जाती है। कृश एवं नष्टपुष्पा (जिसका आर्तव नष्ट हो गया हो अर्थात् Menopause. हो गया हो) धात्री को बृंहण कराने से वह स्वस्थ हो जाती है ।।
बलामूलतुला धौता दशमूलं शतावरी ।।
गुडूची रोहिषं रास्ना वृश्चिकाली पुनर्नवा । वृषः सहचरोशीरसारिवामूर्व च.......... ।।
......................................... । .................... काकजङ्घांऽशुमत्यपि ।।
अश्वगन्धा मृगैर्वारुः कालाऽथ नवमालिका । अतिमुक्तकशाङ्गैंष्टाकपित्थं त्रिफलेति च ।।