काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 572, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २१४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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दशमूलात् प्रभृत्येते भागा दशपलाः स्मृताः । यवाः कुलत्था माषाश्च ........... ।।
................................................ । ........... (जल)द्रोणे चतुर्थागावशेषिते ।।
तं कषायं परिस्त्राव्य पुनरग्नावधिश्रयेत् । अथेमान्यौषधान्यत्र पलिकानि निधापयेत् ।।
द्वे मेदे द्वे हरिद्रे च काकोल्यौ वृषजीवकौ । माषपर्णी ................................... ।।
.............................................. । त्वक्पत्रचन्दनोशीरं द्वे बले लवणद्वयम् ।।
मूर्वा श्वदंष्ट्रा शार्ङ्गष्टा श्यामा द्राक्षा सुरोहिणी ।
मधुकं हस्तिपिप्पल्यः कुष्ठं व्याघ्रनखं वचा ।।
सूक्ष्मैलागुरुकश्मर्यः शतपुष्पा परूषकम् ।
............................................. । ............................... नि च ।।
शङ्खपुष्पी विशल्या च वृश्चिकाली मधूलिका ।
दाडिमानि चाम्लानि गुग्गुल्वादि सुगन्धि च । अक्षोटं पनसं भव्यं प्राचीनमलकानि च ।।
शतावरी विदारी च मधुपर्णी विषा(णिका) ।
.................................................................. ।
.............................. (क)षायार्धाढकं भवेत् ।
लवङ्गपुष्पं कर्पूरं स्पृक्काऽथ कटुकाफलम् ।।
आढकं तिलतैलस्य क्षीरद्रोणं च पाचयेत् । तत् सिद्धं प्रतिसंहृत्य बलातैलं निधापयेत् ।।
घृतभाण्डे दृढे दान्ते ................................ ।
.................................................................. ।
........................................ सां म्रक्षणेषु(प्र)शस्यते ।
बलातैल निर्माण विधि—धोकर शुद्ध की हुई बलामूल (खरैटी की जड़)-१ तुला (१०० पल)। दशमूल, शतावरी, गिलोय, रोहिषतृण, रास्ना, वृश्चिकाली (वरहंटा-मेषशृंगी का भेद), पुनर्नवा, बांसा, सहचर (पियाबांसा), खस, सारिवा, मूर्वा (चव्य) ......, काकजंघा, अंशुमती (शालपर्णी), अश्वगन्धा, मृगैर्वारु (श्वेत अथवा बड़ी इन्द्रवारुणी), काला (त्रिवृत्-काली निशोत), नवमालिका (बासन्ती-नेवारी-वनमोगरा), अतिमुक्तक (तिनिश वृक्ष अथवा नवमल्लिका भेद), शार्ङ्गष्टा (काकमाची-मकोय अथवा गुंजा), कपित्थ (कैथ), त्रिफला तथा दशमूल-प्रत्येक १० पल। तथा यव (जौ), कुलत्थ और उड़द। .... जल १ द्रोण (४ आढक)। इन्हें पकाकर चतुर्थांश रहने पर उस कषाय को छानकर पुनः अग्नि पर रख दे। इसके बाद इसमें निम्न औषधियां प्रत्येक १ पल डालें-मेदा, महामेदा, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, काकोली, क्षीरकाकोली, वांसा, जीवक, माषपर्णी, ... दालचीनी, तेजपत्र, चन्दन, खस, बला, अतिबला (अथवा नागबला), दोनों लवण (सैन्धव तथा सौवर्चल), मूर्वा (मरोड़फली-मोरबेल-चुरनहार), गोखरू, शार्ङ्गष्टा (काकमाची-मकोय अथवा गुंजा), श्यामा (काली त्रिवृत), द्राक्षा, कुटकी, मुलहठी, गजपिप्पली, कुष्ठ, व्याघ्रनख, वच, छोटी इलायची, अगर, गंभारी, सौंफ, परूषक (फालसा) ...., शङ्खपुष्पी, विशल्या (लांगली), वृश्चिकाली (बरहंटा), मधूलिका (गिलोय-अथवा नृत्यकुण्डक नामक तृण धान्य विशेष-मर्कट), अनार आदि अम्लपदार्थ, गुग्गुल आदि सुगन्धित पदार्थ, अखरोट, कटहल, भव्य (फलविशेष, ओट-Dillenia indica), पुराने आंवले, शतावरी, विदारीकन्द, मधुपर्णी (गिलोय), विषाणिका (अजशृंगी-उत्तरवारुणी)..... तथा लौंग के फूल, कपूर, स्पृक्का (सुगन्धशाक विशेषअसवर्ग-Trifolium