भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 573

धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २१५

officinalis), कटुकाफल (कटुतुम्बी या कुटकी)-इनका कषाय आधा आढ़क । तिलतैल-१ आढ़क, दूध-१ द्रोण (४ आढ़क)-इन सबको मिलाकर पकाये। सिद्ध होने पर इस बला तैल को एक दृढ एवं हाथी दांत के बने हुए घृत युक्त (जिसमें पहले से घी का लेप किया गया हो) बर्तन में डालकर रख दें। .... मालिश करने के लिये यह तैल प्रशस्त माना गया है।

शाखागतं कोष्ठगतमस्थिमज्जसिरागतम् ।।
बहिराभ्यन्तरायामं हनुस्तम्भं शिरोभ्रमम् । एकपक्षवधं शोषम्लानकार्दितगुल्मिनम् ।।
बधिरं वेप (मानं च) .................... । ................................... ।।
.......... (ऽ) पस्मारमुन्मादं कटपूतनाम् । कर्णशूलं शिरःशूलं ब्रध्नं मारुतकुण्डलम् ।।
अशीतिं वातिकान् रोगान् योनिदोषांश्च विंशतिम् । रेतोदोषान् ग्रहान् सर्वान् बलातैलमपोहति ।।
वृद्ध्यां ................................ । ................................... ।।
...... ज्वरे जीर्णे तृतीयकचतुर्थके । नारीणां दुष्प्रजातानां योनिशूले श्रमेषु च ।।
नानातिसारज्वरयोः कफरोगेषु सर्वशः । नाजीर्णकृशमूर्च्छासु न च्छर्द्यां च प्रयोजयेत् ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १३९ तमं पत्रम्।)

बला तैल का उपयोग—यह बलातैल शाखा, कोष्ठ, अस्थि, मज्जा, एवं सिरागत रोगों, बाह्यायाम तथा अन्तरायाम, हनुस्तम्भ, शिरोभ्रम, एकाङ्गवध (Paresis), पक्षवध (Paralysis), शोष, म्लानक, अर्दित (facial Paralysis) गुल्म, बधिरता (बहरापन-Deafness), कंपकंपी, अपस्मार, उन्माद, कटपूतना (ग्रहरोग), कर्णशूल, शिरःशूल, ब्रध्न (आन्त्रवृद्धि-Hernia), वातकुण्डलिका, ८० वातरोग, २० योनिदोष, वीर्यदोष तथा सम्पूर्ण ग्रहरोगों को नष्ट करता है। इनके अतिरिक्त वृद्धि, ..... जीर्णज्वर, तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर, दुष्प्रजाता नारियों के योनिशूल एवं श्रम (थकावट), अनेक प्रकार के अतिसार एवं ज्वरों तथा सम्पूर्ण श्लैष्मिक रोगों में इसका प्रयोग करना चाहिये। परन्तु अजीर्ण, कृशता, मूर्च्छा, एवं छर्दि रोग में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये।

वक्तव्य—शाखा—रक्त आदि धातु तथा त्वचा को 'शाखा' शब्द से कहा जाता है। चरक सू. अ. ११ में कहा है—तत्र शाखा रक्तादयो धातवस्त्वक् च, स बाह्यो रोगमार्गः। यह रोग का बाह्यमार्ग समझा जाता है॥

एतेनैव विधानेन रास्नातैलं विपाचयेत् । निहन्ति रोगान् भूयिष्ठं य एते परिकीर्तिताः ।।

इसी उपर्युक्त विधान से ही रास्नातैल का पाक करे। यह भी उपर्युक्त रोगों को नष्ट करता है॥

शतावर्या बदर्याश्च गुडूच्या मधुकस्य च । पुनर्नवाया द्राक्षायाः पीलोः सहचरस्य च ।।
वृषस्य नागवीर्याया अनन्ताशतपुष्पयोः । स्वनामपाकतैलानामेष एव (विधिः स्मृतः) ।।

इसीप्रकार अपने २ नाम के अनुसार शतावरी, बदरी (बेर), गिलोय, मुलहठी, पुनर्नवा, द्रक्षा, पीलु, सहचर (पिया बांसा), बांसा, नागवीर्या, अनन्ता (सारिवा) तथा शतपुष्पा (सौंफ) आदि के तैल के पाक की भी यही विधि है॥

............ लं पक्वं तैले सहाचरे ।।
दद्यान्निर्मथ्य सततमेतद्र विशेषणम् ।

..... इसी प्रकार सहाचर (नीली कटसरैया-काला बांसा) का भी तेल बनाया जाता है। इनमें अन्तर इतना ही है कि उसे पानी में मथकर तैल में डाला जाता है॥