भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 574
२१६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ]

श्योनाकतैलस्य विधिः स एव परिकीर्तितः ।।
कषाये मधुमांसस्य दद्यात् त्रिंशत्पलानि तु ।

श्योनाक तैल की भी यही निर्माण विधि है। इसमें श्योनाक के कषाय (क्वाथ) में ३० पल मधु (शहद अथवा सुरा) और मांस डालना चाहिये ॥

कपित्थतैलस्य विधिः स एव परिकीर्तितः ।।
कपित्थानां तु पक्वानां तुलां दद्यात् स ..... ।

कपित्थ तैल की भी यही निर्माण विधि है। इसमें पके हुए कपित्थ (कैथ) एक तुला (१०० पल) लेना चाहिये... ॥

......................... देव प्रकीर्तितम् ।।
केवलं स्वरसस्यात्र दद्यात्तैलाच्चतुर्गुणम् ।

..... इसी प्रकार इस श्लोक में भी किसी अन्य ओषधि के तेल का निर्माण दिया हुआ है जो कि उपर्युक्त विधान के अनुसार ही तैयार किया जाता है। भेद केवल इतना ही है कि इसमें स्वरस की मात्रा तैल से चतुर्गुण ली जाती है ॥

मीनतैलं च मीनानां कषायेण रसेन च ।।
पक्वं बलातैलमिव वातव्याधिषु शस्यते ।

मछली के कषाय तथा रस से पकाकर मीनतैल बनाया जाता है। इसका भी बलातैल के समान वातव्याधि में प्रयोग करना चाहिये ॥

बलाकाहंसवल्गूनां क्रौञ्चसारसयोरपि ।।
आटीशकुनकानां च तैलान्याहुः स्वनामभिः ।

इसी प्रकार अपने २ नाम के अनुसार बलाका (बिसकण्ठी बगुली), हंस, वल्गु, क्रौञ्च, सारस तथा आटी (दलदल के स्थान में रहने वाला पक्षीविशेष-Tardus-ginginia mus आदि पक्षियों के द्वारा तैल बनाये जाते हैं।

......................... (दौर्गं) न्ध्यनाशनम् ।
विधानं कीर्तितं पुण्यं षण्ढबन्ध्याप्रजाकरम् ।

...... ये दुर्गन्धि को नष्ट करते हैं। नपुंसक तथा बन्ध्या स्त्री के पुत्रोत्पत्ति के लिये इनका विधान दिया गया है ॥

योनिनासामुखश्रोत्रदौर्गन्ध्ये पिच्छिलेषु च ।।
कपित्थतैलं पिचुभिर्धारयेयुः सदा स्त्रियः ।

योनि, नासिका, मुख तथा श्रोत्र की दुर्गन्धि एवं पिच्छिलता में स्त्रियों को सदा पिचु (Swab) के द्वारा कपित्थ तैल को धारण करना चाहिये ॥

सहकाररसेनापि तद्वत्तैलं प्रशम्यते ।।
विविधानां च तैलानां हृद्या .........
............ न्यानां च निषेवणम् ।।

सहकार (आम्र) के रस से भी तैल का निर्माण किया जाता है इसी प्रकार अनेक तरह के हृदय को अच्छे लगने वाले तैलों का प्रयोग करना चाहिये ......... ॥