भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 575

धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २१७

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धातॄणां शेषकर्म यत् ।
स्नेहपानात् प्रसूतानां षष्ठीमल्लकभक्षणात् ।
अतिमात्राशनाच्चैव विरुद्धार्जीर्णभोजनात् ।।
षष्ठिग्रहः कुमाराणां जायते देहनाशनः ।
असाध्यश्चानुष(ङ्गीच) ................
....... (मिता) हारा धर्मशीला तपस्विनी ।
जीर्णाशिनी च सततं षष्ठीमतितरत्यसौ ।
प्राप्तायां वञ्चनायां च पञ्चकर्माणि कारयेत् ।।
अथवा तपसोग्रेण शिवं स्कन्दं च तोषयेत् ।

इसके बाद अब मैं धात्रियों की शेष चिकित्सा कहूंगा। प्रसूता स्त्रियों के स्नेहपान, सांठी के चावल और मल्लक (मत्स्य विशेष) के खाने, अधिक मात्रा में खाने, विरुद्ध भोजन तथा अजीर्ण (पूर्व भोजन के न पचने पर) भोजन से-देह को नष्ट करने वाला बालकों का षष्ठी नामक ग्रहरोग उत्पन्न हो जाता है। यह रोग असाध्य एवं अनुषङ्गी (बहुत देर तक रहने वाला) होता है इसमें मित (मात्रा में) आहार करने वाली, धार्मिक स्वभाव वाली, तपस्विनी तथा पूर्व भोजन के जीर्ण हो जाने पर अगला भोजन करने वाली धात्री षष्ठी नामक ग्रह रोग से मुक्त हो जाती है। तथा इन उपर्युक्त उपचारों से ठीक न होने पर पञ्चकर्म करना चाहिये। अथवा तीव्र तपस्या द्वारा भगवान् शिव एवं स्कन्द (कार्तिकेय) को तुष्ट करना चाहिये ।।

अजीर्णं चापि धात्रीणां नित्यमेव न शस्यते ।।
अजीर्णदूषि (ता दोषा धात्रीणां जनयन्ति हि) । ......... (ऽ)रुचिग्लानिमदमोहविचर्चिकाः ।।
पामाकुष्ठालजीगुल्मह्रद्रोगश्वासकासकाः । हिक्कातन्द्राश्रमश्वासच्छर्द्यपस्मारविग्रहाः ।।
रक्तपित्तभ्रमोन्मादशूलशोषगलग्रहाः । ऊरुस्तम्भः ससंन्यासस्तथाऽन्ये च महागदाः ।।

धात्री को कभी भी अजीर्ण नहीं होना चाहिये। अजीर्ण से दूषित हुए दोष धात्री में अरुचि, ग्लानि, मद, मोह, विचर्चिका, पामा, कुष्ठ, अलजी, गुल्म, हृद्रोग श्वास, कास, हिक्का, तन्द्रा, श्रम-श्वास, छर्दि, अपस्मार, ग्रहरोग, रक्तपित्त, भ्रम, उन्माद, शूल, शोष, गलग्रह, ऊरुस्तम्भ, संन्यास तथा अन्य भी बहुत से भयंकर रोग हो जाते हैं ।।

................................... । मितपथ्याशनान्मातुः पुत्रे तेषामसंभवः ।।
सुखोदयश्च धात्रीणां तस्मात्तदुपपादयेत् ।

माता के परिमित एवं पथ्य आहार करने पर पुत्र में ये उपर्युक्त व्याधियां नहीं हो सकती हैं तथा धात्रियों को भी सुख (स्वास्थ्य) की प्राप्ति होती है इसलिये मित एवं पथ्य आहार का सेवन करना चाहिये ।।

वृद्धजीवक ! लोकेऽस्मिंस्त्रयो दुष्करकारिणः ।।
भिषग्धात्री च बालश्च त एव सुखदुःखिताः ।

हे वृद्धजीवक ! इस संसार में तीन व्यक्ति ऐसे हैं जो दुष्कर कार्यों को करने वाले होते हैं। १. भिषक् (वैद्य), २ धात्री, ३. बालक। ये ही सुखी एवं दुःखी होते हैं। अर्थात् संसार में ये तीन व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें अत्यन्त कठिन से कठिन कार्य करने पड़ते हैं ।।


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