काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 576, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २१८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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परिज्ञानं विना वाताद्योषधकल्पने शिशोः ।।
....................................। शास्त्रानुसारचेष्टाभिरिङ्गितैनित्यदर्शनैः ।।
कर्त्तव्यं भेषजं बाले स कथं नाऽपराध्नुयात् ।
शिशु में वातादि दोषों को बिना जाने ही औषध की कल्पना करनी पड़ती है। इसलिये सदा शास्त्र के अनुसार चेष्टा, इंगित (इशारे) तथा दर्शन के द्वारा बालक की चिकित्सा करनी चाहिये। इसमें गलती नहीं होनी चाहिये॥
भिषक्कौमारभृत्यस्तैः कारणैनित्यदुःखितः ।।
दुष्करं चापि कुरुते युञ्जन् साधारणाः क्रियाः ।
गर्भिण्याः सह गर्भेण धात्र्याः सह सु(तेन च) ।।
....................................। ........................ ज्ञातुमदूषकम् ।
कौमारभृत्य (कुमारों का भरण पोषण करने वाला) वैद्य उन २ कारणों से नित्य दुःखी होता हुआ साधारण चिकित्सा को करता हुआ गर्भसहित गर्भिणी तथा पुत्रसहित धात्री के लिए अत्यन्त दुष्कर कार्यों को करता है॥
धात्री पुत्रशरीरार्थं स्वशरीरोपशोषणम् ।।
स्नेहात् प्राप्नोति सुबहून् क्लेशांश्चान्यान् सुदारुणान् ।
आशास्नेहकृपाधर्मद्रिक्षणार्थं च मातरः ।
सहन्ते सर्वदुःखानि मानिनी चात्र कीर्त्यते । गर्भात् प्रभृति बालोऽपि .......... ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १४० तमं पत्रम्।)
अधिकं पीड्यते दुःखैरकुर्वन्नपि तत् स्वयम् । तस्माच्च धात्री सततं शुभचेष्टाऽशनस्थितिः ।।
माता भवति पुत्राणां भुंक्ते पुत्रफलानि च ।
धात्री स्नेहवश पुत्र-शरीर के लिये अपने शरीर का शोषण करती है तथा अन्य अनेक दारुण क्लेशों (कष्टों) को प्राप्त करती है। आशा, स्नेह, कृपा, धर्म तथा बालक की रक्षा के लिये माताएँ सब प्रकार के दुःखों को सहन करती हैं तथा इसमें वे अपना मान (गौरव) अनुभव करती हैं। गर्भ से लेकर बालक भी स्वयं प्रतीकार न कर सकने के कारण अनेक प्रकार के कष्टों से पीडित होता है। इसलिये धात्री निरन्तर अपनी शुभ चेष्टा तथा आहार-व्यवहार के द्वारा अपने पुत्रों की माता होकर पुत्ररूपी फलों का उपभोग करती है॥
इति ह स्माह भगवान कश्यपः ।।
(इति) वृद्धजीवकीये कौमारभृत्ये चिकित्सास्थाने धात्रीचिकित्सिताध्यायः ।।
(स)माप्तानि च चिकित्सिता.ं ।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति वृद्धजीवकीये कौमारभृत्ये चिकित्सास्थाने धात्रीचिकित्सिताध्यायः।
समाप्तानि च चिकित्सितानि ।।