काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 577, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तमं सिद्धिस्थानम् ।
राजपुत्रीया सिद्धिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ।
अथातो राजपुत्रीयां सिद्धिं वक्ष्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम राजपुत्रीय सिद्धि का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । वमन आदि कर्मों के यथावत् प्रयुक्त न होने से उत्पन्न हुए विकारों की सिद्धि (चिकित्सा) का इस स्थान में उल्लेख किया गया है इसलिये इसे सिद्धि स्थान कहते हैं । चरक सि. अ. १२ में कहा है—कर्मणां वमनादीनामसम्यक्करणापदाम् । यत्रोक्तं साधनं स्थाने सिद्धिस्थानं तदुच्यते ।।
भगवन् राजपुत्राणामन्येषां वा महात्मनाम् । कतिवत्सर (युक्तस्य बस्तिकर्म समीरि) तम् ।। ३ ।।
स्नेहप्रमाणं किं बस्तौ बस्तयः के च तद्धिताः ।
केषु रोगेषु शस्यन्ते बस्तयः केषु गर्हिताः ।। ४ ।।
आस्थापनमवस्थायां कस्यां केषु गदेषु च । बस्तिकर्मप्रमाणं किं ......... ।। ५ ।।
............................... । हिताहित व्यापदः काः किं च तासां चिकित्सितम् ।। ६ ।।
ऋषिमध्ये तथा पृष्टः प्रश्नान् प्रोवाच कश्यपः ।
जीवक ने कश्यप से निम्न प्रश्न पूछे—१. हे भगवन् ! राजपुत्र अथवा अन्य महापुरुषों को कितने वर्ष की अवस्था में बस्ति कर्म करना चाहिये । अर्थात् किस अवस्था के बाद बस्ति दी जानी चाहिये ? । २. बस्ति में स्नेह का क्या प्रमाण होता है ? ३. उनके लिये कौन सी बस्तियां हितकर हैं ? । ४. किन रोगों में बस्ति देनी चाहिये ? । ५. किन में नहीं देनी चाहिये ? ६. आस्थापन बस्ति किस अवस्था में तथा किन रोगों में करनी चाहिये ? । ७. बस्ति का क्या प्रमाण है अर्थात् कितनी बस्तियां देनी चाहिये ? । ८. बस्तियों के हित, अहित तथा व्यापत्तियां (विकृति-उपद्रव) तथा इनकी चिकित्सा क्या है ? ऋषियों के बीच में इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर महर्षिकश्यप ने निम्न उत्तर दिया ।।३-६।।
निबोध सम्यग्भवता महत्कार्यं प्रचोदितम् ।। ७ ।।
बस्तिकर्म हि दुर्ज्ञानं बाल (केषु विशेषतः) । ............................... ।। ८ ।।
इन्हें सम्यक् प्रकार सुनो ! आपने महान् (गम्भीर-विकट) प्रश्न पूछा है। बस्तिकर्म का ज्ञान, विशेषकर बालकों में अत्यन्त कठिन है ।।७-८।।
शिशूनामशिशूनां च बस्तिकर्मामृतं यथा । भिषजामर्थयशसी, शिशोरायुः, प्रजां पितुः ।। ९ ।।
त्रयमेकपदे हन्ति भेषजं दुरुनुष्ठितम् । तस्मादापन्नरोगेषु वातप्रायेषु देहिषु ।। १० ।।