काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 578, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् राजपुत्रीया सिद्धिः १ ]
शिशुओं तथा अन्य युवा आदियों के लिये बस्ति अमृत के समान है। इस बस्ति से वैद्य को धन एवं यश, शिशु को आयु तथा पिता को सन्तान की प्राप्ति होती है। और यदि ओषधि (बस्ति) का ठीक प्रकार से प्रयोग न हो तो उपर्युक्त तीनों एक साथ नष्ट हो जाते हैं। अर्थात् चिकित्सक का धन एवं यश, शिशु की आयु तथा पिता की सन्तान ये तीनों एक साथ समाप्त हो जाते हैं। अतः वातप्रधान रोगों में प्राणियों को बस्ति देनी चाहिये ॥९-१०॥
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(जन्मप्रभृति बालानां) बस्तिकर्मोपकल्पयेत् ॥११॥
इत्याह गार्ग्यो नेत्याह बालत्वादि (द)ति माठरः ।
मासेन शस्यते मासाद् बालो हि स्यादवस्थितः ॥१२॥
गार्ग्य ने कहा—बालकों को जन्म से ही बस्ति दी जा सकती है।
माठर ने कहा—यह ठीक नहीं है क्योंकि उस समय वह अत्यन्त बाल (छोटा) होता है। एक मास के बाद उसे बस्तिकर्म कराना चाहिये क्योंकि मास भर के बाद बालक स्थिर हो जाता है ॥११-१२॥
अल्पान्तरत्वान्नेत्याह तमात्रेयः पुनर्वसुः । चतुर्मास्योऽनुवास्य (स्तु) ......... ॥१३॥
आत्रेय पुनर्वसु ने कहा—यह ठीक नहीं है क्योंकि उस समय उसके अन्तःअवयव अथवा आन्तरिक शब्द बहुत अल्प (थोड़ा कम) होता है। अतः चार मास की अवस्था होने पर उसे अनुवासन (बस्ति) देनी चाहिये ॥१३॥
........... प्राह स्तन्यक्षीरघृताशनात् । ऊर्ध्वाधो बृंहमाणस्तु रोगैः संतर्पणोद्भवैः ।।
कृच्छ्रसाध्यो भवेद्ग्रस्तस्मात् संवत्सराद्धितम् । तदा शक्यश्च शक्तश्च बालो व्रजति जल्पति ।।
मति ............................. । ........................... ऋभुक् ।।
यह ठीक नहीं है (यहां पर आचार्य का नाम खण्डित है)। स्तन्य (माता के स्तनों का) दूध, एवं घृत के सेवन द्वारा ऊर्ध्व एवं अधोमार्ग द्वारा बृंहण किया जाता हुआ संतर्पण जन्य रोगों से आक्रान्त होने से बालक कृच्छ्रसाध्य होता है अर्थात् उस अवस्था में बस्ति द्वारा बृंहण करने से उसे संतर्पण जन्य रोग हो जाते हैं जो कि कृच्छ्रसाध्य होते हैं। चरक सू. अ. २३ में संतर्पण जन्य रोग निम्न दिये हैं—प्रमेहकण्डूपिडकाः कोठपाण्ड्वामयज्वराः। कुष्ठान्यामप्रदोषश्च मूत्रकृच्छ्रमरोचकः ॥ तन्द्राक्लैब्यमतिस्थौल्यमालस्यं गुरुगात्रता । इन्द्रियस्रोतसां लेपो बुद्धेर्मोहः प्रमीलकः ॥ शोफाश्चैवंविधाश्चान्ये शीघ्रम्प्रतिकुर्वतः ॥ अतः एक वर्ष की अवस्था के बाद बस्तिकर्म कराना चाहिये। उस समय बालक समर्थ एवं शक्तिमान् हो जाता है तथा वह चलने-फिरने एवं बोलने लगता है और अन्न का सेवन प्रारंभ कर देता है ॥
पाराशर्यस्तु नेत्याह तदा दुर्ललितो हि सः ।।
त्रिवर्षस्यैव तु हितं
पाराशर ने कहा—यह ठीक नहीं है क्योंकि उस समय बालक का पालन-पोषण ठीक नहीं होता है। इसलिये तीन वर्ष के बाद बस्तिकर्म करना उचित है।
नेति भेलस्तमब्रवीत् ।
अल्पान्तरत्वाव्याघाताद्विभ्रमाणामसंसहात् ।।
षड्वर्षप्रभृतीनां तु भेल ........... ।