काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 579, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजपुत्रीया सिद्धिः १ ] सिद्धिस्थानम् २२१
भेल ने कहा है—यह ठीक नहीं है—क्योंकि उस समय तक बालक की आन्तरिक शक्ति थोड़ी होती है तथा वह व्याघातों एवं विभ्रमों को सहन नहीं कर सकता है । इसलिये भेल ने कहा ६ वर्ष के बालकों को बस्तिकर्म कराना चाहिये ।।
....... षु पक्षेषु सूक्ष्मेष्वपि पुनः पुनः ।।
निश्चयार्थं ततः सर्वे कश्यपं पर्यचोदयन् । स तेभ्यो निश्चयं प्राह शिशूनां बस्तिकर्मणि ।।
अधस्तनोऽन्नभोक्ता च चयदावा ....... ।
इस प्रकार बार २ अत्यन्त सूक्ष्म पक्षों (वादों) के उत्पन्न हो जाने पर, उन सबने इसके विषय में निश्चय करने के लिये महर्षि कश्यप से प्रार्थना की । तब महर्षि कश्यप ने शिशुओं के बस्ति कर्म के लिये अपना निर्णय दिया कि जो बालक नीचे चलता-फिरता हो तथा अन्न खाता हो अर्थात् जिस की गोद की अवस्था व्यतीत हो गई हो और जिसने अन्न खाना प्रारंभ कर दिया हो—उसे बस्तिकर्म कराना चाहिये । अर्थात् जब तक बालक गोद में है तथा उसने अन्न खाना प्रारंभ न किया हो तब तक बस्ति नहीं देनी चाहिये । उसके बाद ही बस्तिकर्म कराना चाहिये ।।
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भिषक् पुण्याहे कनकरजतताम्रकांस्यत्रपुसीसलोहगजदन्तरुवेणुशृङ्गास्थिनलानामन्यतमस्योपपत्त्यामत्रकं कारयेच्छ्लक्ष्णमव्रणमृजु गुलिकामुखं गोपुच्छ.......
बस्तिनेत्र (Nozzle)—वैद्य पुण्य (मंगलकारक) दिन में सोना, चांदी, ताम्र, कांसा, बंग, सीसा, लोहा, हाथी दांत, वृक्षों की लकड़ी, बांस, सींग, अस्थि तथा कमल नाल में से किसी का चिकना, अव्रण (जिस पर व्रण न हो अथवा जो व्रण उत्पन्न न करे) तथा सीधा, गुलिका के समान गोलाई लिये हुए मुख वाला और गोपुच्छ के आकार का बस्तिनेत्र बनवावे । चरक सि. अ. ३ में भी कहा है—सुवर्णरूप्यत्रपुताम्ररीतिकांस्यास्थिलोहद्रुमवेणुदन्तैः । नर्लविषाणैर्मणिभिश्च तैस्तैः कार्याणि नेत्राणि त्रिकर्णिकानि ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३५ में भी कहा है ।।
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(इति ताडपत्रपुस्तके १४१ तमं पत्रम् १ ।)
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नोष्णोदकपरिशेकगन्धशुक्लवसनकुसुमरोचनाप्रतिसराब्यलङ्करणभोजनविनोदान् क्रमेण सुखानाप्नुयात् । प्रक्षणोत्सादनोष्णोदकपरिशेकभोजनान्यहन्यहनि प्रागनुवासनादिष्यन्ते । पश्चान्निरूहेभ्य अ...........कोष्णोद-कोपचारब्रह्मचर्योपसेवनं च विरिक्तवदिति परिषत् ।।
जिस रोगी को बस्ति देनी हो उसे क्रमशः उष्ण जल का परिषेक, गन्ध, श्वेत वस्त्र, एवं फूल का धारण, रुचिकारक प्रतिसर (शुद्धि), अलंकार (आभूषण), भोजन तथा विनोद आदि सुखकारक भावों का सेवन करावे । फिर अनुवासन बस्ति से पूर्व, स्नेह की मालिश, उबटन, उष्ण जल का परिषेक, एवं उष्ण भोजन प्रतिदिन देना चाहिये । इसके बाद जिनका निरूह (आस्थापन बस्ति) किया जा चुका हो .......... (उन्हें सम्यक् प्रकार से अनुवासन देवे) ........ फिर अनुवासन के बाद विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया हो) रोगी की तरह उष्ण जल द्वारा उपचार तथा ब्रह्मचर्य का सेवन इत्यादि करना चाहिये । अर्थात् जब तक वह रोगी बल एवं वर्ण से युक्त न हो जाय तब तक विरेचन में कहे गये विधान के अनुसार कर्म करे । मुख-पैर आदि का धोना, निवात गृह में रहना, ऊंचे बोलने आदि का त्याग तथा पेया आदि का क्रम उसी
१. अस्याग्रे पत्रमेकं खण्डितं ताडपत्रपुस्तके ।