काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 580, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | राजपुत्रीया सिद्धिः ९ ] |
|---|
प्रकार करना चाहिये। इसमें धूम्रपान नहीं करना चाहिये क्योंकि विरेचन के बाद धूम्रपान का निषेध है। चरक सू. अ. ५ में कहा है—'न विरिक्तः पिबेद्धूमम्'। तथा चरक सू. अ. १५ में भी विरेचन के उपरान्त धूम्रपान का निषेध किया गया है—'सम्यग्विरिक्तं चैनं वमनान्तरोक्तेन धूमवर्जेन विधिनोपपादयेदाबलवर्णप्रतिलाभात्'। इसके बाद रोगी के लिये निम्न विधान दिया है—बलवर्णोपपन्नं चैनमनुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजोर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुपहतवस्त्रस्वातमनुरूपालंकारालंकृतं सुहृदां दर्शयित्वा ज्ञातीनां दर्शयेत्, अथैनं कामेष्ववसृजेत्। यह सारा कर्म अनुवासन के बाद रोगी को कराना चाहिये। यह कर्म (पथ्य आहार-विहार आदि) बस्ति काल के समय से दुगुने समय तक होना चाहिये। चरक सि. अ. १ में कहा है—'कालस्तु बस्त्यादिषु याति यावास्तावान् भवेद्धि परिहारकालः'।
तत्र श्लोकाः—
एतेन विधिना बस्तीन् दद्यादेकान्तरं भिषक्। अहन्यहनि बस्तीनां प्रणिधानं विनाशनम् ।।
स्नेहो गुरुः स्वभावेन बहुत्वान्द्र ............ । ................ च्छूल ज्वरोऽरुचिः ।।
आनाहाध्मानकृमयो विड्भेदः कुष्ठसंभवः। अपस्मारजडत्वाद्यास्तस्मादेकान्तरं हितः ।।
इस विधि से वैद्य एक २ दिन छोड़कर (Alternate days) बस्तियां देवे। प्रतिदिन बस्तियां देना अहितकर होता है। क्योंकि स्नेह के स्वभाव से ही अत्यन्त गुरु होने से (प्रतिदिन अनुवासन किया हुआ पचता नहीं) और शूल, ज्वर, अरुचि, आनाह, आध्मान, कृमि, अतिसार, कुष्ठ, अपस्मार तथा जड़ता आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिये एक दिन छोड़कर ही बस्ति देनी चाहिये ।।
एकान्तरमपि प्राप्ते बस्तौ देये शरीरिणाम्। न देयो धातुवैषम्ये धातूनेव स सादयेत् ।।
एक दिन छोड़कर (Alternate days) बस्ति देते हुए भी यह ध्यान रखना चाहिये कि रोगी की धातुएँ समावस्था में हों। धातुओं की विषमता होने पर दिया गया अनुवासन धातुओं को ही नष्ट कर देता है ।।
............................. (वि) चक्षणः। निरूहयेदर्थतन्तु ह्रासवृद्ध्या निरूहयन् ।।
इसके बाद ज्ञानी वैद्य को चाहिये कि रोगी को निरूह (आस्थापन) बस्ति देवे। निरूह बस्ति क्रमशः धीरे २ बढ़ावे तथा घटावे ।।
जडीभवन्ति स्रोतांसि स्नेहदानात् पुनः पुनः ।।
उद्घाटनार्थं शुद्ध्यर्थं तेषामास्थापनं हितम् ।।
बार २ अनुवासन बस्ति के द्वारा स्नेह का व्यवहार कराने से रोगी के स्रोत जड़ हो जाते हैं। उन स्रोतों को खोलने तथा उनकी शुद्धि के लिये उन्ह आस्थापन (निरूह) बस्ति देनी चाहिये ।।
निरूहकाले संप्राप्ते यो बालो न निरूह्यते। स .................................... ।।
निरूह (आस्थापन अथवा शोधन) बस्ति के काल के उपस्थित होने पर भी जिस बालक को निरूह (आस्थापन) बस्ति नहीं दी जाती ........ (उसे अनेक प्रकार के रोग हो जाते हैं) ।।
स्विन्नं पर्युषितं जीर्णं निवातशयनादिकम्। स्वभ्यक्तमकृताहारं भिषग्बालं निरूहयेत् ।।
जिसने स्वेदन किया हुआ है तथा जिसका पहले दिन का भोजन जीर्ण हो चुका है, जो निवात (जहां सीधी वायु न आती हो) स्थान में शयन करता हो, जिसने शरीर पर तेल की मालिश की हुई है तथा जिसने भोजन नहीं किया है—ऐसे बालक को वैद्य निरूह बस्ति दे ।।