भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 581

राजपुत्रीया सिद्धिः १ ] सिद्धिस्थानम् २२३

वातं मूत्रं पुरीषं च देहिनां विषमस्थितम्। अनुलोमयते शीघ्रं निरूहः साधु योजितः।।

सम्यक् निरूह के लक्षण—सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त किया गया निरूह प्राणियों के विषम अवस्था में स्थित वात, मूत्र एवं पुरीष का शीघ्र ही अनुलोमन कर देता है अर्थात् वात, मूत्र, पुरीष आदि की गति को अनुलोम कर देता है। चरक सि. अ. १ में कहा है—प्रसृष्टविण्मूत्रसमीरणत्वं रुच्यग्निवृद्ध्याशयलाघवानि। रोगोपशान्तिः प्रकृतिस्थता च बलं च तत्स्यात्सुनिरूढलिङ्गम्।।

आमं जडत्वमरचि विष्टम्भं दो ........ । ............................ दीपयत्यपि ।।

सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त किया हुआ निरूह आमरोग, जड़ता, अरुचि तथा विष्टम्भ को दूर करता है और अग्नि को प्रदीप्त करता है ।।

वस्त्रस्य धावनमिव दर्पणस्येव मार्जनम्।
आस्थापनं नृणां तद्वत् प्राज्ञैः कालोपपादितम्।

बुद्धिमान् व्यक्ति द्वारा प्राणियों में उचित काल में प्रयुक्त किया गया आस्थापन (निरूह) वस्त्र को धोने तथा दर्पण को साफ करने के समान हैं। अर्थात् वस्त्र को धोने एवं दर्पण को साफ करने के समान ही आस्थापन (निरूह) बस्ति रोगी की आन्तरिक सफाई कर देती है ।।

अनुवासनवच्चास्य विधिः सर्वः प्रशस्यते। निरूहः पुनरावृत्तान्न तु वेगान् विधारयेत् ।।

निरूहबस्ति के बाद भी अनुवासन के समान ही सम्पूर्ण विधि करनी चाहिये। निरूह पुनः प्रवृत्त हुए वेगों को धारण नहीं करता ।।

निरुपद्रवमाश्वस्तं .................... । .................... णां विकारे स्नानमिष्यते ।।

उपद्रवों से रहित रोगी को आश्वासन देकर ....... विकारों में स्नान कराना चाहिये ।।

हृद्रोगे पार्श्वशूलेषु कुष्ठेषु कृमिकोष्ठिषु। प्रमेहोदरगुल्मेषु वातशूले सकुण्डले ।।
संसृष्टदोषरोगेषु लीनगम्भीरगेषु च। रक्ते श्लेष्मणि वा दुष्टे निरूहमुपकल्पयेत् ।।

निरूह किन रोगों में करना चाहिये—हृद्रोग, पार्श्वशूल, कुष्ठ, कृमिरोग (उदरकृमि), प्रमेह, उदररोग, गुल्म, वातशूल, वातकुण्डल, संसृष्ट (मिले हुए) दोषों वाले, छिपे हुए तथा गम्भीर रोगों में और रक्त एवं श्लेष्मा के दूषित होने पर निरूह (आस्थापन) बस्ति की कल्पना करे ।।

.................................................. येत् ।।
आकेशाग्रनखाग्रेभ्यो बस्तिर्बृंहयते नरान्।

बस्ति मनुष्यों के केशों (बालों) के सिरों से लेकर नखों के अग्रभाग तक अर्थात् सम्पूर्ण शरीर का बृंहण करती है। चरक सि. अ. ७ में कहा है—आपादतलमूर्धस्थान्दोषान् पक्वाशये स्थितः। वीर्येण बस्तिरादत्ते खस्थोऽर्को भूरसानिव ।। अर्थात् जिस प्रकार आकाश स्थित सूर्य भूमिस्थित रसों को खींच लेता है उसी प्रकार पक्वाशय में स्थित होती हुई बस्ति भी अपने वीर्य के कारण सम्पूर्ण शरीर के दोषों को खीच लेती है। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३५ में भी कहा है ।।

वर्णतेजोबलकरमायुष्यं शुक्रवर्धनम् ।।
योनिप्रसादनं धन्यं वन्ध्यानामपि पुत्रदम् ।।

३७ का.सं.

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