काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् त्रिलक्षणा सिद्धिः २ ]
बस्तिकर्म (कृतं) काले बालानाममृतोपमम् ।
वातिकान् वातसंसृ(ष्टान्) ......... ।।
............ हबीजं सर्वं बस्तिरपोहति ।
बस्ति के गुण—योग्य काल में किया गया बस्तिकर्म बालकों के लिये अमृत के समान होता है। यह वर्ण, तेज, बल, आयु तथा शुक्र को बढ़ाता है। योनि का प्रसादन (स्वच्छता) करता है, बन्ध्या स्त्रियों को भी पुत्र देने के कारण यह धन्य है अर्थात् इसके प्रयोग से बन्ध्या स्त्रियों को भी पुत्र हो जाता है। तथा बालकों के लिये यह अमृत के समान है। बस्ति वातिक एवं वातसंसृष्ट (वायु मिले हुए) रोगों को नष्ट करती है तथा यह सम्पूर्ण रोगों के बीजों को नष्ट कर देती है ॥
यासां च गर्भाः स्रंसन्ते जाता वा न दृढाः सुताः ।
सुकुमार्यश्च या नार्यः सुभगा नित्यमैथुनाः ।।
बहुस्त्रीकाश्च ये बाला ईश्वराणामयौवनाः ।
संक्षीयन्तेऽतिसङ्गाद्वा ये च ........... ।
............... तेषां प्रशस्तममृतं यथा ।।
जिन स्त्रियों के गर्भ का स्राव (Abortion) हो जाता है, अथवा उत्पन्न होने पर भी जिनके पुत्र दृढ़ नहीं होते, जो स्त्रियां बहुत अधिक सुकुमारियां (नाजुक) तथा सुभगा हैं, जो नित्य मैथुन कराती हैं, जो बहुत स्त्रियों वाले पुरुष हैं अर्थात् जिन पुरुषों के कई स्त्रियां हों तथा धनी पुरुषों के जो बालक यौवन से पूर्व ही अत्यन्त स्त्रीसङ्ग (मैथुन) से क्षीण हो गये हों-उन सबके लिये बस्ति का प्रयोग अमृत के समान है ॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति सिद्धिस्थाने) राजपुत्रीया सिद्धिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति सिद्धिस्थाने राजपुत्रीया सिद्धिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।।
त्रिलक्षणा सिद्धिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ।
अथातस्त्रिलक्षणां सिद्धिं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम त्रिलक्षणा (तीन लक्षणों वाली) सिद्धि का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।
त्रिविधं लक्षणं पश्येन्नृणां पञ्चसु कर्मसु । दुर्यो ..................................... ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १४३ तमं पत्रम् ।)