भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 583

त्रिलक्षणा सिद्धिः २ ] सिद्धिस्थानम् २२५

प्राणियों के पञ्चकर्म (वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन एवं शिरोविरेचन) में तीन प्रकार के लक्षणों को देखना चाहिये-१. दुर्योंग (अयोग) २. अतियोग ३. सम्यक्यो‍ग ।।

............................ च पण्डितः । शरीरयात्रां कायाग्निं शक्तिं वर्णं बलं स्वरम् ।। दोषांश्च विकृतान् दृष्ट्वा यथादोषं विशोधयेत् । सर्वदोषाः प्रशाम्यन्ति बलमायुर्वपुर्वयः ।। अग्निः प्रजाश्च ............................ । ............................ ।।

पण्डित (विद्वान् वैद्य) शरीर-यात्रा, जठराग्नि, शक्ति, वर्ण, बल, स्वर तथा विकृत दोषों को देखकर यथादोष (दोष के अनुसार) उनका शोधन करे। इससे सब दोष शान्त हो जाते हैं तथा बल, आयु, शरीर, वय (अवस्था), अग्नि तथा प्रजा (सन्तान) की वृद्धि होती है ।।

विरेचनेन शुद्ध्यन्ति प्रसीदन्तीन्द्रियाणि च । धातवश्च विशुद्ध्यन्ते बीजं भवति कार्मुकम् ।।

विरेचन से इन्द्रियां शुद्ध तथा प्रसन्न होती हैं, रस, रक्त आदि धातुयें शुद्ध होती हैं, तथा बीज (शुक्राणु अथवा डिम्ब) अधिक कार्य करने में समर्थ हो जाता है ।।

मेदोदौर्गन्ध्यकफजै रोगैर्वान्तश्च मुच्यते । रोगोपशान्तिर्ह्रासो वा विशुद्धिर्लाघवासु ..... ।।

वमन के द्वारा रोगी मेद, दुर्गन्धि एवं कफज रोगों से मुक्त हो जाता है, रोग की शान्ति अथवा उसमें कमी हो जाती है, शरीर की शुद्धि हो जाती है तथा शरीर में लघुता आ जाती है ।।

............................ । (आमाश)यस्य पूर्णत्वं गौरवं हृदयस्य च ।। शीतज्वरागमाध्मानं ष्ठीवनं च मुहुर्मुहुः । शिरोग्रहोऽरुचिर्जाड्यमग्निसादोऽतिनिद्रता ।। आलस्यं व्याधिवृद्धिश्चं विद्याद्दुर्वान्तलक्षणम् ।

दुर्वांत अथवा वमन के अयोग के लक्षण—आमाशय का पूर्ण (भरा) होना, हृदय का भारीपन, सर्दी से ज्वर का आना, आध्मान, बार २ थूकना (मुख से पानी आना), शिरोग्रह, अरुचि, जड़ता, अग्निमांद्य, अतिनिद्रा, आलस्य तथा रोग की वृद्धि-ये दुर्वांत अथवा वमन के अयोग के लक्षण होते हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है—दुश्छर्दिते स्फोटकोठकण्डूहृत्खाविशुद्धिर्गुरुगात्रता च। अर्थात् वमन के ठीक प्रकार न होने से स्फोट, कोठ, कण्डू, हृदय, स्रोतों एवं इन्द्रियों का शुद्ध न होना तथा देह का भारीपन ये लक्षण होते हैं।।

.................................................. ।। ............ सां च व्यथनमतिवान्तस्य लक्षणम् ।

अतिवान्त अथवा वमन के अतियोग के लक्षण-वमन के अतियोग में सम्पूर्ण स्रोतों में व्यथा (पीडा) होती है। चरक सि. अ. १ में कहा है—'तृणमोहमूर्च्छानिलकोषनिद्राबलातिहानिर्वमनेऽति च स्यात्' अर्थात् वमन के अतियोग से तृषा, मोह, मूर्च्छा, वातप्रकोप, निद्रानाश तथा निर्बलता आदि लक्षण होते हैं ।।

यदा तु पित्तं रक्तं वा पुरीषं मिश्रमेव वा ।। वमत्यविरसं शूली न स सिद्ध्यति कुर्वतः ।

जब वमन में पित्त, रक्त, अथवा पुरीष (मल) मिला हुआ आता हो, वमन बहुत पतला होता हो तथा शूल (उदरशूल) होता हो-उस रोगी की चिकित्सा करने पर भी आराम नहीं होता ।।