काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् त्रिलक्षणा सिद्धिः २ ]
आमपक्वाशयौ पित्तं गुदो गर्भाशयासृजी ।।
विरेक ........................................ ।
................................... क्षुद्वातमूत्रानुलोमता ।
लाघवं चाग्निदीप्तिश्च सम्यक्स्त्रसितलक्षणम् ।।
सम्यक् विरेचन के लक्षण—आमाशय, पक्वाशय, पित्त, गुदा, गर्भाशय एवं रक्त ठीक अवस्था में रहते हैं। भूख लगती है। वायु एवं मूत्र की गति अनुलोम हो जाती है। देह में लघुता आती है एवं अग्नि दीप्त होती है—ये सम्यक् विरेचन के लक्षण होते हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है—स्रोताविशुद्धीन्द्रियसंप्रसादौ लघुत्वमूर्जोऽग्निरनामयत्वम्। प्राप्तिश्च विट्पित्तकफानिलानां सम्यग्विरिक्तस्य भवेत्क्रमेण ।। अर्थात् विरेचन के सम्यक् योग में स्रोतों की शुद्धि, इन्द्रियों की प्रसन्नता, शरीर में लघुता एवं उत्साह, अग्नि की दीप्ति, आरोग्य आदि लक्षण होते हैं तथा उसमें क्रमशः पुरीष, पित्त, कफ और वायु निकलते हैं ।।
कृच्छ्रविण्मूत्रता त्वक्पिटका ज्वरसंभवः । अरुचिर्गौरवाध्माने दुर्विरिक्तस्य लक्षणम् ।।
विरेचन के अयोग के लक्षण—मल एवं मूत्रत्याग में कष्ट (कठिनाई), त्वचा पर पिडकाएं, ज्वर की उत्पत्ति, अरुचि, शरीर का भारीपन तथा आध्मान ये दुर्विरिक्त अथवा विरेचन के अयोग के लक्षण हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है—स्याच्छ्लेष्मपित्तानिलसंप्रकोपः सादस्तथाग्नेर्गुरुता प्रतिश्या । तन्द्रा तथा छर्दिररोचकश्च वातानुलोम्यं न च दुर्विरिक्ते ।। अर्थात् विरेचन के अयोग में कफ पित्त तथा वायु का प्रकोप, अग्निमांद्य, शरीर का भारी होना, प्रतिश्याय, तन्द्रा, वमन, अरुचि तथा वायु का अनुलोम न होना—ये लक्षण होते हैं ।।
मूर्च्छा शूलं गुदभ्रंशो वात ............. । ............................ ।।
विरेचन के अतियोग के लक्षण—विरेचन के अतियोग से मूर्च्छा, शूल, गुदभ्रंश तथा अन्य वातिक विकार आदि हो जाते हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है—कफास्रपित्तक्षयजानिलोत्थाः सुप्त्यङ्गमर्दक्लमवेपनाद्याः । निद्राबलाभावतमःप्रवेशाः सोन्मादहिक्काश्च विरेचितेऽति ।। अर्थात् विरेचन के अधिक होने पर कफ, रक्त एवं पित्त का क्षय हो जाता है जिससे वायु के प्रकुपित हो जाने पर सुप्ति (शरीर का सुन्न होना-सोया हुआ होना), अङ्गमर्द, क्लम, कम्पन, निद्रानाश, कमजोरी, आंखों के सामने अंधेरा आ जाना, उन्माद तथा हिक्का आदि उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं ।।
बृंहणं कर्शनं चैव द्विविधं नस्यकर्म तु । बृंहणं वातरुक्प्राये कफाधिक्ये तु कर्शनम् ।।
बृंहणं विविधैः स्नेहैर्मधुरौषधसंस्कृतैः । रूक्षैर्वा कटुसिद्धैर्वा स्नेहैः कर्शनमुच्यते ।।
नस्यकर्म (शिरोविरेचन) दो प्रकार का होता है—१. बृंहण २. कर्षण। बृंहण नस्य वातप्रधान तथा कर्षण नस्य श्लेष्मप्रधान रोगों में दिया जाता है। अनेक प्रकार की मधुर ओषधियों से संस्कृत स्नेह (तैल आदि) द्वारा बृंहण तथा रूक्ष एवं कटु ओषधियों से सिद्ध स्नेहों द्वारा कर्षण नस्य दिया जाता है ।।
ते गुणा बृंहण .......................... । ......................... नस्यमुच्यते ।।
उपर्युक्त गुणों से युक्त बृंहण ...... तथा कर्षण नस्य प्रशस्त माने गये हैं ।।१९।।
रोगशान्तिः प्रमोदश्च देहयात्रानुवर्तनम् । स्मृतिमंधाबलाग्न्याप्तिरिन्द्रियाणां प्रसन्नता ।।
विद्धि सम्यक्कृते नस्ये दुर्योगास्तदलक्षणैः ।
सम्यक् नस्य (शिरोविरेचन) के लक्षण—रोगों की शान्ति, प्रमोद (अन्द), शरीर-यात्रा का अनुवर्तन (शरीरयात्रा का ठीक होना), अरति, मेधा, बल, जाठराग्नि की आप्ति (तृप्ति) तथा इन्द्रियों की प्रसन्नता—सम्यक् प्रकार से किये गये